ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य
Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)
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सूत्र विषय पृष्ठ
२६ ब्रह्मविद्याके फल-वर्णनमे हानि ( दुःखनाश आदि ) और प्राप्ति
(परमपदकी प्राप्ति आदि ) दोनों प्रकारके फलोंका सर्वत्र
सम्बन्ध ... ... ... २७२-२७४
२७-३२ ब्रह्मलोकमे जानेवाले ज्ञानी महात्माके पुण्य और पापोंकी
यहीं समाप्ति, संकल्पानुसार ब्रह्मलोक-गमन या यहीं ब्रह्म-
सायुज्यकी प्राप्ति सम्भव, ब्रह्मलोक जानेवाले सभी उपासकोंके
लिये देवयानमार्गसे गमनका नियम, किन्तु कारक पुरुषोंके
लिये इस नियमका अभाव ... ... २७४-२७८
३३-४१ अक्षरब्रह्मके लक्षणोंका सर्वत्र ब्रह्मके वर्णनमे अध्याहार
आवश्यक, मुण्डक, कठ और श्वेताश्वतर आदिमे जीव और
ईश्वरको एक साथ हृदयमे स्थित बतानेवाली विद्याओकी
एकता, ब्रह्म जीवात्माका भी अन्तर्यामी आत्मा है, इसमे
विरोधका परिहार, जीव और ब्रह्मके भेदकी औपाधिकताका
निराकरण एवं विरोध-परिहार ... ... २७८-२८६
४२-५२ ब्रह्मलोकमे जानेवाले सभी पुरुषोंके लिये भोग भोगनेका
अनिवार्य नियम नहीं, बन्धनसे मोक्ष ही विद्याका मुख्य फल,
कर्मसे मुक्तिका प्रतिपादन करनेवाले पूर्वपक्षका उल्लेख और
खण्डन, ब्रह्मविद्यासे ही मुक्तिका प्रतिपादन तथा साधकोंके
भावानुसार विद्याके फलमे भेद ... ... २८६-२९४
५३-५४ शरीरसे भिन्न आत्माकी सत्ता न माननेवाले नास्तिक-मतका
खण्डन ... ... २९४-२९५
५५-६० यज्ञाङ्गसम्बन्धी उपासना प्रत्येक वेदकी शाखावालोके लिये
अनुष्ठेय है, एक-एक अङ्गकी अपेक्षा, सब अङ्गोंसे पूर्ण उपासना
श्रेष्ठ है, शब्दादि भेदसे विद्याओंमे भिन्नता है, फल एक होनेसे
साधककी इच्छाके अनुसार उनके अनुष्ठानमे विकल्प है;
किंतु भिन्न-भिन्न फलवाली उपासनाओंके अनुष्ठानमे कामनाके
अनुसार एकाधिक उपासनाओंका समुच्चय भी हो सकता है—
इन सब बातोका वर्णन ... ... २९५-२९८
६१-६६ यज्ञाङ्ग-सम्बन्धी उपासनाओमे समुच्चय या समाहारका खण्डन ... २९८-३००
चौथा पाद
१ ज्ञानसे ही परम पुरुषार्थकी सिद्धि .. ३०१
२-७ ‘विद्या कर्मका अङ्ग है’ जैमिनिके इस मतका उल्लेख ... ३०२-३०४
८-१७ जैमिनिके उक्त मतका खण्डन तथा ‘विद्याकर्मका अङ्ग
नहीं, ब्रह्मप्राप्तिका स्वतन्त्र साधन है’ इस सिद्धान्तकी पुष्टि ३०५-३१०
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