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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished417 pages

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Page 155

१३४ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
होनेसे ही जड प्रधान सृष्टि-कार्यमे प्रवृत्त हो सकता है, अन्यथा नहीं; परन्तु
सांख्यमतमें तो पुरुष असङ्ग और उदासीन माना गया है, अतः वह प्रेरक हो
नहीं सकता। इसलिये केवल जड प्रकृतिके द्वारा जगत्की उत्पत्ति किसी प्रकार
भी सिद्ध नहीं हो सकती।
सम्बन्ध—अब प्रधानकारणवादके विरोधमे दूसरी युक्ति देते हैं—
अङ्गित्वानुपपत्तेश्च ॥ २ । २ । ८ ॥
अङ्गित्वानुपपत्तेः=अङ्गाङ्गिभाव ( सत्त्वादि गुणोंके उत्कर्ष और अपकर्ष )
की सिद्धि न होनेके कारण; च=भी ( केवल प्रधान इस जगत्का कारण नहीं
माना जा सकता ) ।
व्याख्या—पहले यह बताया गया है, सांख्यमतमे तीनो गुणोंकी साम्यावस्थाका
नाम ‘प्रधान’ है। यदि गुणोंकी यह साम्यावस्था स्वाभाविक मानी जाय, तब तो
कभी भी भंग न होगी, अतएव गुणोंमें विषमता न होनेके कारण अङ्गाङ्गिभाव-
की सिद्धि न हो सकेगी; क्योंकि उन गुणोंमें ह्रास और वृद्धि होनेपर ही बढ़े
हुए गुणको अङ्गी और घटे हुए गुणको अङ्ग माना जाता है। यदि उन गुणोंकी
विषमता ( ह्रास-वृद्धि ) को ही स्वाभाविक माना जाय तब तो सदा जगत्की
सृष्टिका ही क्रम चलता रहेगा, प्रलय कभी होगा ही नहीं। यदि पुरुषकी
प्रेरणासे प्रकृतिके गुणोंमें क्षोभ होना मान लें तब तो पुरुषको असङ्ग और निष्क्रिय
मानना नहीं बन सकेगा। यदि परमेश्वरको प्रेरक माना जाय तब तो यह
ब्रह्म कारणवादको ही स्वीकार करना होगा। इस प्रकार सांख्यमतके अनुसार
गुणोंका अङ्गाङ्गिभाव सिद्ध न होनेके कारण जड प्रधानको जगत्का कारण मानना
असङ्गत है।
सम्बन्ध—यदि अन्य प्रकारसे गुणोंकी साम्यावस्था भंग होकर प्रकृतिके द्वारा
जगत्की उत्पत्ति होती है, ऐसा मान लिया जाय तो क्या हानि है ? इसपर
कहते हैं—
अन्यथानुमितौ च ज्ञशक्तिवियोगात् ॥ २ । २ । ९ ॥
अन्यथा=दूसरे प्रकारसे; अनुमितौ=साम्यावस्था भंग होनेका अनुमान
कर लेनेपर; च=भी; ज्ञशक्तिवियोगात्=प्रधानमे ज्ञान-शक्ति न होनेके कारण
( गृह, घट, पट आदिकी भाँति बुद्धिपूर्वक रची जानेवाली वस्तुओंकी उत्पत्ति
उसके द्वारा नहीं हो सकती ) ।