ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य
Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)
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Read in contextसूत्र २-४ ] अध्याय २ १३१
काम करती है, यह सहज ही अनुमान किया जा सकता है । शास्त्र भी इस
अनुमानका समर्थक है—‘योऽप्सु तिष्ठन्••••अपोऽन्तरो यमयति ।’ ( बृह० उ०
३ । ७ । ४ ) अर्थात् ‘जो जलमे रहनेवाला है और उसके भीतर रहकर
उसका नियमन करता है।’ ‘एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि प्राच्योऽन्या
नद्य. स्यन्दन्ते’ ( बृह० उ० ३ । - ८ । ९ ) अर्थात् ‘हे गार्गि ! इस अक्षर
( परमात्मा ) के ही प्रशासनमे पूर्ववाहिनी तथा अन्य नदियाँ बहती है ।’ इत्यादि
श्रुतिवाक्योसे सिद्ध होता है कि समस्त जड वस्तुओका अधिष्ठाता चेतन है।
गायके थनमे जो दूध उतरता है, उसमे भी चेतन गौका वात्सल्य और चेतन
बछड़ेका चूसना कारण है । इसी प्रकार जल नीची भूमिकी ओर ही स्वभावत
बहता है । लोगोके उपकारके लिये वह स्वयं उठकर ऊंची भूमिपर नही
चला जाता । परन्तु चेतन पुरुष अपने प्रयत्नसे उस जलके प्रवाहको जिधर
चाहें मोड़ सकते है । इस प्रकार प्रत्येक प्रवृत्तिमे चेतनकी अपेक्षा सर्वत्र
देखी जाती है; इसलिये किसी भी युक्तिसे जड प्रधानका स्वतः जगत्की रचनामे
प्रवृत्त होना सिद्ध नहीं होता ।
सम्बन्ध—अब प्रकारान्तरसे प्रधानकारणवादका खण्डन करते है—
व्यतिरेकानवस्थितेश्च अनपेक्षत्वात् ॥ २ । २ । ४ ॥
च=इसके सिवा; व्यतिरेकानवस्थितेः=सांख्यमतमे प्रधानके सिवा, दूसरा
कोई उसकी प्रवृत्ति या निवृत्तिका नियामक नहीं माना गया है, इसलिये,
( और ) अनपेक्षत्वात्=प्रधानको किसीकी अपेक्षा नहीं है, इसलिये भी
( प्रधान कभी सृष्टिरूपमे परिणत होता और कभी नहीं होता है, यह बात
सम्भव नहीं जान पड़ती ) ।
व्याख्या—सांख्यमतावलम्बियोकी मान्यताके अनुसार त्रिगुणात्मक प्रधानके
सिवा, दूसरा कोई कारण, प्रेरक या प्रवर्तक नहीं माना गया है । पुरुष उदासीन
है, वह न तो प्रधानका प्रवर्तक है, न निवर्तक । प्रधान स्वयं भी अनपेक्ष है,
वह किसी दूसरेकी अपेक्षा नहीं रखता । ऐसी स्थितिमे जड प्रधान कभी तो
महत्तत्त्व आदि विकारोंके रूपमे परिणत होता है और कभी नहीं होता है, यह
कैसे युक्तिसंगत होगा । यदि जगत्की उत्पत्ति करना उसका स्वभाव अथवा
धर्म है, तब तो प्रलयके कार्यमें उसकी प्रवृत्ति नहीं होगी ? और यदि स्वभाव नहीं है