ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य
Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)
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Read in context१२० वेदान्त-दर्शन [ पाद १
आदिका उपदेश व्यर्थ होगा। और यदि इस दोषसे बचनेके लिये ब्रह्मको सावयव
मान लिया जाय तब तो उसे 'अवयवरहित अजन्मा' आदि बतानेवाले श्रुतिके
शब्दोंसे स्पष्ट ही विरोध आता है; सावयव होनेपर वह नित्य और सनातन भी
नहीं रह सकेगा; इसलिये ब्रह्मको जगत्का कारण मानना युक्तिसंगत नहीं है।
सम्बन्ध-इस शङ्काके उत्तरमें कहते हैं—
श्रुतेस्तु शब्दमूलत्वात् ॥ २ । १ । २७ ॥
तु=किंतु (यह दोष नहीं आता क्योंकि); श्रुतेः=श्रुतिसे (यह सिद्ध है
कि ब्रह्म जगत्का कारण होता हुआ भी निर्विकाररूपसे स्थित है); शब्द-
मूलत्वात्=ब्रह्मका स्वरूप कैसा है ? इसमे वेद ही प्रमाण है (इसलिये वेद
जैसा वर्णन करता है, वैसा ही उसका स्वरूप मानना चाहिये)।
व्याख्या—पूर्वपक्षीने जो दोष उपस्थित किये है, वे सिद्धान्तपक्षपर लागू
नहीं होते; क्योंकि वह श्रुतिपर आधारित है । श्रुतिने जिस प्रकार ब्रह्मसे जगत्-
की उत्पत्ति बतायी है, उसी प्रकार निर्विकार रूपसे ब्रह्मकी स्थितिका भी प्रति-
पादन किया है । (देखिये श्वेताश्वतर ६। १६—१९ तथा मुण्डक
१। १। ९) अतः श्रुतिप्रमाणसे यही मानना ठीक है कि ब्रह्म जगत्का कारण
होता हुआ भी निर्विकार रूपसे नित्य स्थित है। वह अवयवरहित और
निष्क्रिय होते हुए ही जगत्का अभिन्ननिमित्तोपादान कारण है। उस सर्वशक्तिमान्
परमेश्वरके लिये कोई बात असम्भव नहीं है। वह मन-इन्द्रिय आदिसे अतीत है, इनका
विषय नहीं है। उसकी सिद्धि कोरे तर्क और युक्तिसे नहीं होती। उसके लिये
तो वेद ही सर्वोपरि निर्भ्रान्त प्रमाण है। वेदने उसका स्वरूप जैसा बताया है, वैसा
ही मानना चाहिये। वेद उस परब्रह्मको अवयवरहित बतानेके साथ ही यह भी
कहता है कि 'वह सम्पूर्णरूपेण जगत्के आकारमें परिणत नहीं होता।' यह समस्त
ब्रह्माण्ड ब्रह्मके एक पादमें स्थित है, शेष अमृतस्वरूप तीन पाद परमधाममें स्थित हैं,*
- तावानस्य महिमा ततो ज्यायाश्च पूरुषः ।
पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ॥ (छा० उ० ३ । १२ । ६)