Skip to content
SarvaKosh
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

Report a copyright issue

DevanagariSanskritpublished417 pages

Page 137 of 417

Read in context
Page 137

११६ वेदान्त-दर्शन [ पाद १
अर्थात् प्रकाशक बतलाया है। (बृ० उ० ४ । ३ । ४-६) फिर उस आत्माका
स्वरूप पूछे जानेपर विज्ञानमय जीवको आत्मा बताया। (बृ० उ० ४। ३। ७)
तदनन्तर जाग्रत, स्वप्न तथा सुषुप्ति आदि अवस्थाओके भेदका वर्णन करते हुए
कहा है कि 'यह जीव सुषुप्तिकालमें बाहर-भीतरके ज्ञानसे शून्य होकर परब्रह्म परमात्मासे
संयुक्त होता है।' (बृ० उ० ४ । ३ । २१) तत्पश्चात् मरणकालकी स्थितिका
निरूपण करते हुए बताया है कि 'उस परब्रह्मसे अधिष्ठित हुआ यह एक शरीरसे
दूसरे शरीरमे जाता है।' (बृ० उ० ४ । ३ । ३५) इस वर्णनसे जीव और
ब्रह्मका भेद स्पष्ट हो जाता है। इसी प्रकार छान्दोग्योपनिषद्मे जो यह कहा है
कि 'अनेन जीवेनात्माननुप्रविश्य' इत्यादि; इसका अर्थ जीवरूपसे ब्रह्मका प्रवेश
करना नहीं, अपितु जीवके सहित ब्रह्मका प्रवेश करना है। ऐसा माननेसे ही
श्वेताश्वतरोपनिषद् (४। ६) मे जो जीव और ईश्वरको एक ही शरीररूप
वृक्षपर रहनेवाले दो पक्षियोकी भाँति बताया गया है, वह सङ्गत होता है।
(एवं) कठोपनिषद्मे जो द्विवचनका प्रयोग करके हृदयरूपी गुहामे प्रविष्ट दो तत्त्वो
(जीवात्मा और परमात्मा) का वर्णन किया गया है। श्वेताश्व० (१।९) मे
जो सर्वज्ञ और अल्पज्ञ विशेषण देकर दो अजन्मा आत्माओं (जीव और ईश्वर)
का प्रतिपादन हुआ है तथा श्रुतिमे जो परब्रह्म परमेश्वरको प्रकृति एवं जीवात्मा
दोनोपर शासन करनेवाला कहा गया है, इन सब वर्णनोकी सङ्गति भी जीव
और ब्रह्ममे भेद माननेपर ही हो सकती है। अन्तर्यामि-ब्राह्मणमे तो स्पष्ट शब्दोमे
जीवात्माको ब्रह्मका शरीर कहा गया है (बृ० उ० ३। ७। २२)। मैत्रेयी
ब्राह्मण (बृ० उ० २ । ४ । ५) में परमात्माको जानने तथा ध्यान करने
योग्य बताया है। इस प्रकार वेदमे जीवात्मा और परमात्माके भेदका वर्णन होनेसे
यही सिद्ध होता है कि वह जगत्का कर्ता, धर्ता और सहर्ता परमेश्वर जीव नहीं;
किन्तु उससे अधिक अर्थात् जीवके स्वामी है। 'तत्त्वमसि' 'अयमात्मा ब्रह्म'
इत्यादि वाक्योद्वारा जो जीवको ब्रह्मरूप बताया गया है, वह पूर्ववर्णित कारण
और कार्यकी अनन्यताको लेकर है। परमेश्वर कारण है और जड-चेतनात्मक
जगत् उनका कार्य है। कारणसे कार्य अभिन्न होता है, क्योंकि वह उसकी ही
शक्तिका विस्तार है। इसी दृष्टिसे जीव भी परमात्मासे अभिन्न है। फिर भी उनमे
स्वरूपगत भेद तो है ही। जीव अल्पज्ञ है, ब्रह्म सर्वज्ञ। जीव ईश्वरके अधीन
है, परमात्मा सबके शासक और स्वामी है। अतः जीव और ब्रह्मका अत्यन्त