ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य
Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)
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Read in context१०८ वेदान्त-दर्शन [ पाद १
स्वपक्षदोषाच्च ॥ २ । १ । १० ॥
स्वपक्षदोषात् = वादीके अपने पक्षमे उपर्युक्त सभी दोष आते हैं, इसलिये;
च = भी; प्रधानको जगत्का कारण मानना ठीक नहीं है।
व्याख्या—सांख्यमतावलम्बी स्वयं यह मानते हैं कि जगत्का कारणरूप
प्रधान अवयवरहित, अव्यक्त और अग्राह्य है। उससे साकार, व्यक्त तथा देखने-
सुननेमे आनेवाले जगत्की उत्पत्ति मानना तो कारणसे विलक्षण कार्यकी उत्पत्ति
माननेका दोष स्वीकार करना है। तथा जगत्की उत्पत्तिके पहले कार्यके
शब्द, स्पर्श आदि धर्म प्रधानमे नहीं रहते और कार्यकी उत्पत्तिके पश्चात् कार्यमे
आ जाते हैं, यह माननेके कारण उनके मतमे असत्से सत्की उत्पत्ति स्वीकार
करनेका दोष भी ज्यो-का-त्यो रहा। इसके सिवा, प्रलयकालमे जब समस्त कार्य
प्रधानमें विलीन हो जाते हैं, उस समय कार्यके शब्द, स्पर्श आदि धर्म प्रधानमें
नहीं रहते; ऐसी मान्यता होनेके कारण वादीके मतमे भी कारणमे कार्यके
धर्म आ जानेकी शङ्का पूर्ववत् बनी रहती है। इसलिये वादीके द्वारा उपस्थित
किये हुए तीनो दोष उसके प्रधानकारणवादमें ही पाये जाते हैं, अतः प्रधानको
जगत्का कारण मानना कदापि उचित नहीं है।
सम्बन्ध—उपर्युक्त कथनपर वादीद्वारा किये जा सकनेवाले आक्षेपको स्वयं
उपस्थित करके सूत्रकार उसका निराकरण करते हैं—
तर्काप्रतिष्ठानादप्यन्यथानुमेयमिति चेदेवमप्यनिर्मोक्ष-
प्रसङ्गः ॥ २ । १ । ११ ॥
चेद् इति = यदि ऐसा कहो कि; तर्काप्रतिष्ठानात् = तर्कोंकी स्थिरता न
होनेपर; अपि = भी; अन्यथानुमेयम् = दूसरे प्रकारसे अनुमानके द्वारा कारणका
निश्चय करना चाहिये; एवम् अपि = तो ऐसी स्थितिमे भी; अनिर्मोक्षप्रसङ्गः =
मोक्ष न होनेका प्रसङ्ग आ जायगा।
व्याख्या—एक मतावलम्बीद्वारा उपस्थित की हुई युक्तिको दूसरा नहीं
मानता, वह उसमें दोष सिद्ध करके दूसरी युक्ति उपस्थित करता है; किन्तु इस
दूसरी युक्तिको वह पहला नहीं मानता, वह उसमे भी दोष सिद्ध करके नयी ही
युक्ति प्रस्तुत करता है। इस प्रकार एकके बाद दूसरे तर्क उठते रहनेसे उनकी