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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished417 pages

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सूत्र १६-१७ ] अध्याय १ ९१
जगद्वाचित्वात् ॥ १ । ४ । १६ ॥
जगद्वाचित्वात् = सृष्टि या रचनारूप कर्म जडचेतनात्मक संपूर्ण जगत्का
वाचक है, इसलिये ( चेतन परमेश्वर ही इसका कर्ता है, जड प्रकृति नहीं ) ।
व्याख्या-कौषीतकि-ब्राह्मणोपनिषद्मे अजातशत्रु और बालाकिके संवाद-
का वर्णन है । वहाँ बालाकिने 'य एष आदित्ये पुरुषस्तमेवाहमुपासे।' (४।२)
अर्थात् 'जो सूर्यमे यह पुरुष है, उसकी मै उपासना करता हूँ।' यहाँसे
लेकर अन्तमे 'य एष सव्येऽक्षन् पुरुषस्तमेवाहमुपासे।' ( ४ । १७ )—जो
यह बायाँ आँखमे पुरुष है, उसको मै उपासना करता हूँ।' यहाँतक क्रमशः
सोलह पुरुषोकी उपासना करनेवाला अपनेको बताया; परन्तु उसकी प्रत्येक बातको
अजातशत्रुने काट दिया । तब वह चुप हो गया । फिर अजातशत्रुने कहा—
'बालाके ! तू ब्रह्मको नहीं जानता, अतः मै तुझे ब्रह्मका उपदेश करता हूँ ।
तेरे बताये हुए सोलह पुरुषोका जो कर्ता है, जिसके ये सब कर्म है, 'वही
जानने योग्य है ।'* इस प्रकार वहाँ पुरुष-वाच्य जीवात्मा और उनके अधिष्ठानभूत
जड शरीर दोनोको ही परब्रह्म परमेश्वरका कर्म बताया गया है; अतः कर्म या
कार्य शब्द जड-चेतनात्मक संपूर्ण जगत्का वाचक है । इसलिये जड प्रकृति
इसका कारण नहीं हो सकती; परब्रह्म परमेश्वर ही इसका कारण है ।
सम्बन्ध-उपर्युक्त प्रकरणमें 'ज्ञेय'रूपसे बताया हुआ तत्त्व प्राण या जीव
नहीं, ब्रह्म ही है, इसकी पुष्टिके लिये सूत्रकार कहते हैं--
जीवमुख्यप्राणलिङ्गान्नेति चेत्तद् व्याख्यातम् ॥ १ । ४ । १७ ॥
चेत् इति=यदि ऐसा कहो कि; जीवमुख्यप्राणलिङ्गात् = ( उस प्रसङ्गके
वाक्यशेषमें ) जीव तथा मुख्यप्राणके बोधक लक्षण पाये जाते है, इसलिये ( प्राण-
सहित जीव ही ज्ञेय तत्त्व होना चाहिये ); न=ब्रह्म वहाँ ज्ञेय नहीं है; ( तो )
तद् व्याख्यातम्=इसका निराकरण पहले किया जा चुका है ।
व्याख्या-यदि यह कहो, कि 'यहाँ वाक्यशेषमे जीव और मुख्यप्राणके
सूचक लक्षणोका स्पष्टरूपसे वर्णन है, इसलिये प्राणोके सहित उसका अधिष्ठाता
जीव ही जगत्का कर्ता एवं ज्ञेय बताया गया है।' तो यह उचित नहीं है, क्योकि

  • ब्रह्म ते ब्रवाणि स होवाच यो वै बालाक एतेषां पुरुषाणां कर्ता यस्य वैतत्कर्म
    स वै वेदितव्यः । ( ४ । १८ )