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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished417 pages

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सूत्र १३—१५ ] अध्याय १ ८९
आकाशादिषु=आकाश आदि किसी भी क्रमसे रचे जानेवाले पदार्थोंमें;
कारणत्वेन=कारणरूपसे; च=तो; यथाव्यपदिष्टोक्तेः=सर्वत्र एक ही वेदान्त-
वर्णित ब्रह्मका प्रतिपादन किया गया है; इसलिये ( परब्रह्म ही जगत्‌का कारण है )।
व्याख्या—वेदमे जगत्‌के कारणोका वर्णन नाना प्रकारसे किया गया है तथा
जगत्‌की उत्पत्तिका क्रम भी अनेक प्रकारसे बताया गया है, तथापि केवल परब्रह्म-
को ही जगत्‌का कारण माननेमें कोई दोष नहीं है; क्योकि जगत्‌के दूसरे कारण
जो आकाश आदि कहे गये हैं, उनका भी परम कारण परब्रह्मको ही बताया गया
है। इससे ब्रह्मकी ही कारणता सिद्ध होती है, अन्य किसीकी नहीं। जगत्‌की
उत्पत्तिके क्रममे जो भेद आता है, वह इस प्रकार है—कहीं तो 'आत्मन
आकाशः संभूतः' ( तै०उ० २ । १) इत्यादि श्रुतिके द्वारा आकाश आदिके क्रमसे
सृष्टि बतायी गयी है। कहीं 'तत्तेजोऽसृजत' ( छा० उ० ६ । २ । ३ )
इत्यादि मन्त्रोद्वारा तेज आदिके क्रमसे सृष्टिका प्रतिपादन किया गया है। कहीं
'स प्राणमसृजत' ( प्र० उ० ६ । ४ ) इत्यादि वाक्योंद्वारा प्राण आदिके क्रमसे
सृष्टिका वर्णन किया गया है। कहीं 'स इमाँल्लोकानसृजत । अम्भो मरीचीर्मर-
मापः' ( ऐ० उ० १ । १ । २ ) इत्यादि वचनोंद्वारा बिना किसी सुव्यवस्थित
क्रमके ही सृष्टिका वर्णन मिलता है। इस प्रकार सृष्टि-क्रमके वर्णनमे भेद
होनेपर भी कोई दोषकी बात नहीं है, बल्कि इस प्रकार विचित्र रचनाका वर्णन
तो ब्रह्मके महत्त्वका ही द्योतक है। कल्पभेदसे ऐसा होना सम्भव भी है।
इसलिये ब्रह्मको ही जगत्‌का कारण बताना सर्वथा सुसंगत है।
सम्बन्ध—"उपनिषदोंमें कहीं तो यह कहा है कि 'पहले एकमात्र असत् ही
था' ( तै० उ० २ । ७)। कहीं कहा है 'पहले केवल सत् ही था' ( छा० उ०
६ । २ । १)। कहीं 'पहले अव्याकृत था' ( बृह० उ० १ । ४ । ७ )
ऐसा वर्णन आता है। उपर्युक्त 'असत्' आदि शब्द ब्रह्मके वाचक कैसे हो सकते
हैं ?” ऐसी शङ्का होनेपर कहते हैं—
समाकर्षात् ॥ १ । ४ । १५ ॥
समाकर्षात्=आगे-पीछे कहे हुए वाक्यका पूर्णरूपसे आकर्षण करके उसके
साथ सम्बन्ध जोड़ लेनेसे ( 'असत्' आदि शब्द भी ब्रह्मके ही वाचक सिद्ध
होते है ) ।