ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य
Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)
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Read in contextसूत्र ८-९ ] अध्याय १ ८५
कारणभूता परमेश्वरकी शक्तिका वाचक है; हि=क्योकि; एके=एक शाखावाले-
तथा=ऐसा ही; अधीयते=अध्ययन (वर्णन) करते हैं।
व्याख्या—छान्दोग्योपनिषद् (६। २। ३, ४) मे परमेश्वरसे उत्पन्न तेज आदि
तत्त्वोंसे जगत्के विस्तारका वर्णन है। अतः यहाँ यही मानना ठीक है कि
उनकी कारणभूता परमेश्वर-शक्तिको ही 'अजा' कहा गया है। छान्दोग्यमे बताया
गया है कि 'उस परमेश्वरने विचार किया; 'मै बहुत हो जाऊँ।' फिर उसने
तेजको रचा; तत्पश्चात् तेजसे जल और जलसे अन्नकी उत्पत्ति कही गयी है,
इसके बाद इनके तीन रूपोंका वर्णन है। अग्निमे जो लाल रंग है, वह तेज-
का है, जो सफेद रंग है, वह जलका है तथा जो काला रंग है, वह अन्न
(पृथिवी) का है।' इस प्रकार प्रत्येक वस्तुमे उक्त तेज आदि तीनो तत्त्वोकी
व्यापकताका वर्णन है (छा० उ० ६। ४। १ से ७ तक)। इसी तरह
श्वेताश्वतरोपनिषद्मे जो 'अजा' के तीन रंग बताये गये है, वे भी तेज आदिमें
उपलब्ध होते हैं। अतः निश्चित रूपसे यह नहीं कहा जा सकता कि यहाँ
अजाके नामसे प्रधानका ही वर्णन है। यदि प्रकृति या प्रधानका वर्णन मान
लिया जाय तो भी यही मानना होगा कि वह उस परब्रह्मके अधीन रहनेवाली
उसीकी अभिन्न शक्ति है, जो उक्त तेज आदि तीनो तत्त्वोकी भी कारण है।
सांख्यशास्त्रोक्त प्रधानका वहाँ वर्णन नहीं है; क्योकि श्वेताश्वतरोपनिषद्
(१। १०) मे जहाँ उसका 'प्रधान' के नामसे वर्णन हुआ है, वहाँ भी उसको
स्वतन्त्र नहीं माना है। अपितु क्षर-प्रधान अर्थात् भगवान्की शक्तिरूप अपरा
प्रकृति, अक्षर-जीवात्मा अर्थात् भगवान्की परा प्रकृति-इन दोनोंको शासन
करनेवाला उस परम पुरुष परमेश्वरको बताया है। * फिर आगे चलकर स्पष्ट
कर दिया है कि भोक्ता (अक्षरतत्त्व), भोग्य (क्षरतत्त्व) और उन दोनोंका
प्रेरक ईश्वर-इन तीनो रूपोंमें ब्रह्म ही बताया गया है।† अतः 'अजा' शब्द-
का पर्याय 'प्रधान' होनेपर भी वह सांख्यशास्त्रोक्त 'प्रधान' नहीं है। अपितु
परमेश्वरके अधीन रहनेवाली उसीकी एक शक्ति है।
सम्बन्ध—"अनादि ईश्वर-शक्तिको यहाँ 'अजा' कहा गया है; यह बात कैसे
मानी जा सकती है; क्योंकि वह तो रूप आदिसे रहित है और यहाँ अजाके
✡ क्षरं प्रधानममृताक्षरं हरः क्षरात्मानावीशते देव एक.। (श्वेता० १।१०)
† भोक्ता भोग्यं प्रेरितारं च मत्वा सर्वं प्रोक्तं त्रिविधं ब्रह्ममेतत्। (श्वेता० १।१२)