ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
by महर्षि वेदव्यास
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भक्तोंके तो वे जीवनबन्धु ही हैं। कृपानिधान श्रीकृष्णने कृपापूर्वक कंसको मञ्चसे खींच लिया और लीलासे ही उसको मार डाला। उस समय राजा कंसको सम्पूर्ण जगत् श्रीकृष्णमय दिखायी दे रहा था। मृत्युके पश्चात् उसके निकट हीरेके हारोंसे विभूषित रत्नमय विमान आ पहुँचा और वह दिव्य रूप धारण करके समृद्धिशाली हो उस विमानसे विष्णुधाममें जा पहुँचा। मुने ! कंसका उत्कृष्ट तेज श्रीकृष्णके चरणारविन्दमें प्रविष्ट हो गया। उसका और्ध्वदैहिक संस्कार एवं सत्कार करके श्रीहरिने ब्राह्मणोंको धनका दान किया। इसके बाद राज्य एवं राजाका छत्र बुद्धिमान् उग्रसेनको सौंप दिया। चन्द्रवंशी उग्रसेन पुनः यादवोंके 'राजेन्द्र' हो गये।
कंसकी माता, पत्नियाँ, पिता, बन्धु-बान्धव, मातृवर्गकी स्त्रियाँ, बहिन तथा भाइयोंकी स्त्रियाँ भी विलाप करने लगीं। वे बोलीं—'राजेन्द्र ! उठो, राजसिंहासनपर बैठकर हमें दर्शन दो। ब्रह्मासे लेकर कीटपर्यन्त चराचर प्राणियोंका आधारभूत जो असंख्य विश्व हैं, उन सबकी जो स्वयं ही लीलापूर्वक सृष्टि करते हैं; ब्रह्मा, शिव, शेष, धर्म, सूर्य तथा गणेश आदि देवता, मुनीन्द्रवर्ग और देवेन्द्रगण जिनका दिन-रात ध्यान करते हैं; वेद और सरस्वती भयभीत हो जिनका स्तवन करती हैं; प्रकृतिदेवी भी हर्षसे उल्लसित हो जिनके गुण गाती हैं; जो प्रकृतिसे परे, प्राकृतस्वरूप, स्वेच्छामय, निरीह, निर्गुण, निरञ्जन, परात्परतर ब्रह्म, परमात्मा, ईश्वर, नित्यज्योतिःस्वरूप, भक्तोंपर अनुग्रहके लिये ही दिव्य देह धारण करनेवाले, नित्यानन्दमय, नित्यरूप तथा नित्य अविनाशी शरीर धारण करनेवाले हैं; वे ही मायापति भगवान् गोविन्द भूतलका भार उतारनेके लिये मायासे गोपबालकके वेषमें अवतीर्ण हुए हैं। वे सर्वेश्वर प्रभु जिसे मारते हैं, उसकी रक्षा कौन पुरुष कर सकता है ? इसी प्रकार वे सर्वात्मा श्रीहरि जिसकी रक्षा करते हों उसे मारनेवाला भी कोई नहीं है*।'
महामुने ! ऐसा कहकर सब लोग चुप हो गये। परिवारके लोगोंने ब्राह्मणोंको भोजन कराया और उन्हें सब प्रकारका धन दिया। सर्वात्मा भगवान् श्रीकृष्ण भी पिताके निकट गये और उनकी बेड़ी-हथकड़ी काटकर उन्होंने माता और पिता दोनोंको बन्धनसे मुक्त किया। तत्पश्चात् उन देवेश्वरने दण्डकी भाँति पृथ्वीपर पड़कर माता-पिताको साष्टाङ्ग प्रणाम किया और भक्तिसे मस्तक झुकाकर उनकी स्तुति की।
श्रीभगवान् बोले—जो पुरुष पिता और माताका तथा विद्यादाता एवं मन्त्रदाता गुरुका पोषण नहीं करता, वह जीवनभर पापसे शुद्ध नहीं होता। समस्त पूजनीयोंमें पिता वन्दनीय महान् गुरु हैं। परंतु माता गर्भमें धारण एवं पोषण करती है; इसलिये पितासे भी सौगुनी श्रेष्ठ है। माता पृथ्वीके समान क्षमाशीला और सबका समानरूपसे हित चाहनेवाली है; अतः भूतलपर सबके लिये मातासे बढ़कर बन्धु दूसरा कोई नहीं है। साथ ही यह भी सच है कि विद्यादाता और मन्त्रदाता गुरु मातासे भी बहुत बढ़-चढ़कर आदरके योग्य हैं। वेदके अनुसार गुरुसे बढ़कर वन्दनीय और पूजनीय दूसरा कोई नहीं है।
मुने ! ऐसा कहकर श्रीकृष्ण और बलरामने माताको प्रणाम किया। फिर माता-पिताने भी उन दोनोंको आदरपूर्वक गोदमें बिठा लिया और उन्हें उत्तम मिष्ठान्न भोजन कराया। नन्द और ग्वालबालोंको भी बड़े आदरसे खिलाया। बच्चोंका मङ्गल-कृत्य कराया और उसके उपलक्ष्यमें भी बहुत-से ब्राह्मणोंको जिमाया। उस समय वसुदेवने प्रसन्नतापूर्वक ब्राह्मणोंको बहुत धन दिया। (अध्याय ७१-७२)
* स यं हन्ति च सर्वेशो रक्षिता तस्य कः पुमान्। स यं रक्षति सर्वात्मा तस्य हन्ता न कोऽपि च॥
(७२। १०५)