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ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished810 pages

Page 676 of 810

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Page 676

६६६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

जा रहा था। वह बड़ा बलवान् और अहंकारी था तथा यौवनके मदसे उन्मत्त हो सदा उद्दण्डतापूर्ण बर्ताव किया करता था। महामुने! श्रीकृष्णने उससे विनयपूर्वक वस्त्र माँगा। उसने वस्त्र तो उन्हें दिया नहीं, उलटे कठोर बातें सुनायीं।

**धोबी बोला—**ओ मूढ़! तू गोप-जनोंका लाड़ला है। यह वस्त्र गायके चरवाहोंके योग्य नहीं है; अत्यन्त दुर्लभ और राजाओंके ही उपयोगमें आने योग्य है।

धोबीकी यह बात सुनकर मधुसूदन हँसे। बलदेव, अक्रूर और गोपगण भी हँसने लगे। श्रीकृष्णने एक ही तमाचेमें उस धोबीका काम तमाम करके कपड़ोंका वह गट्ठर ले लिया और सखाओंसहित उन्होंने अपनी रुचिके अनुसार वस्त्र धारण किये। वह रजकराज (धोबियोंका सरदार) दिव्य देह धारण करके श्रीकृष्ण-पार्षदोंसे वेष्टित रत्नमय विमानद्वारा गोलोकको चला गया। उसका वह दिव्य शरीर अक्षय यौवनसे युक्त, जरा और मृत्युका निवारक, श्रेष्ठ पीताम्बरसे सुशोभित, मन्द मुस्कानसे विलसित, श्यामकान्तिसे कमनीय और मनोहर था। गोलोकमें पहुँचकर वह भी वहाँके पार्षदोंमें एक पार्षद हो गया। वहाँ अपने मनको वशमें रखकर वह नित्य-निरन्तर श्रीकृष्णके शुभागमनका चिन्तन करता रहा। उधर मथुरामें सूर्यदेव अस्ताचलको चले गये। तब श्रीकृष्णकी आज्ञा लेकर अक्रूर अपने घरको गये और श्रीकृष्ण भी नन्द एवं बलदेव आदिके साथ आनन्दपूर्वक किसी वैष्णवके घर गये, जो कपड़ा बुननेका व्यवसाय करता था। उसने अपना सर्वस्व भगवान्‌को समर्पित कर रखा था। उस भक्तने श्रीनिवासको प्रणाम करके उनका पूजन किया और भगवान्‌ने उसको अपना वह दास्यभाव प्रदान किया जो ब्रह्मा आदि देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। वहाँ उत्तम मिष्टान्न भोजन करके सब लोग पलंगपर सो गये। तदनन्तर श्रीकृष्ण कुब्जाके घर पधारे। उसने स्वागत किया। भगवान्‌ने उसको बताया—'प्रिये! श्रीरामावतारके समय तुमने मेरे लिये तप किया था; अतः अब मुझसे मिलकर जरा-मृत्युरहित और अत्यन्त दुर्लभ मेरे परमधाम गोलोकको जाओ।' इसी समय गोलोकसे एक रत्ननिर्मित रथ वहाँ आया और कुब्जा दिव्य देह धारण करके उसीके द्वारा गोलोकको चली गयी। मुने! वह वहीं चन्द्रमुखी गोपी हो गयी और कितनी ही गोपियाँ उसकी परिचारिका हुईं।

भगवान् नन्दनन्दन भी क्षणभर कुब्जाके यहाँ ठहरकर पुनः अपने निवास-मन्दिरमें लौट आये, जहाँ नन्दजी सानन्द विराजमान थे। उधर भयविह्वल कंसने रातको नींद आ जानेपर दुःखद दुःस्वप्न देखा, जो उसकी मृत्युका सूचक था। उसने देखा, सूरज आकाशसे गिरकर पृथ्वीपर पड़ा है और उसके चार खण्ड हो गये हैं। मुने! इसी तरह चन्द्रमण्डल भी आकाशसे भूमिपर गिरकर दस खण्डोंमें विभक्त दिखायी दिया। उसने कुछ ऐसे पुरुष देखे, जिनकी आकृति विकृत थी। वे हाथोंमें रस्सी लिये नंग-धड़ंग दिखायी देते थे। एक विधवा शूद्री दृष्टिगोचर हुई, जो नंगी थी और