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ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished810 pages

Page 674 of 810

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Page 674

६६४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण


बाहर निकाल दिया। तत्पश्चात् नन्दनन्दन नन्दके श्रेष्ठ प्राङ्गणमें सानन्द आये। वे परमानन्दमय, नित्यानन्दस्वरूप तथा सनातन हैं। नित्य-अनित्य सब उन्हींके रूप हैं। वे नित्यबीजस्वरूप, नित्यविग्रह, नित्याङ्गभूत, नित्येश तथा नित्यकृत्यविशारद हैं। उनके रूप, यौवन, वेश-भूषा तथा किशोर-अवस्था—सभी नित्य नूतन हैं। उनके सम्भाषण, प्रेम-प्राप्ति, सौभाग्य, सुधा-रससे सराबोर मीठे वचन, भोजन तथा पद भी नित्य नवीन हैं। इस अत्यन्त रमणीय प्राङ्गणमें खड़े-खड़े मायायुक्त मायेश्वर अत्यन्त स्नेहमें डूब गये। तत्पश्चात् वे वहाँसे जानेको उद्यत हुए। केलेके सुन्दर खम्भों और रेशमी डोरेमें गूँथे हुए आम्र-पल्लवोंकी बन्दनवारोंसे उस आँगनको सजाया गया था। विश्वकर्माने उसकी फर्शमें पद्मराग मणि जड़ दी थी। कस्तूरी, केसर और चन्दनसे उसका संस्कार किया गया था। अक्रूर तथा बान्धवजनोंसहित श्रीकृष्ण स्वयं वहाँ थोड़ी देर खड़े रहे। यशोदाने बायीं ओरसे और आनन्दयुक्त नन्दने दाहिनी ओरसे आकर अपने लालाको हृदयसे लगा लिया। बन्धु-बान्धवोंने उनसे प्रेमभरी बातें कीं तथा मैया और बाबाने लालाका मुँह चूमा।

मुने! तदनन्तर श्रीकृष्ण गुरुजनोंको नमस्कार करके आँगनसे बाहर निकले और स्वर्गीय रथपर आरूढ़ हो सुन्दर मथुरापुरीकी ओर चल दिये। मथुरा अपनी शोभासे इन्द्रकी अमरावतीपुरीको परास्त करके अत्यन्त मनोहर दिखायी देती थी। श्रीकृष्णने अक्रूर तथा सखाओंके साथ उस रमणीय नगरीमें प्रवेश किया। श्रेष्ठ रत्नोंसे खचित और विश्वकर्माद्वारा रचित मथुरापुरी सुन्दर बहुमूल्य रत्ननिर्मित कलशोंसे सुशोभित थी। सैकड़ों सुन्दर, श्रेष्ठ और अभीष्ट राजमार्गोंसे वह नगरी घिरी हुई थी। वे राजमार्ग चन्द्रकान्त मणियोंके सारभागसे जटिल होनेके कारण चन्द्रमाके समान ही प्रकाशित होते थे। वहाँ विचित्र मणियोंके सारतत्त्वसे शत-शत वीथियोंका निर्माण किया गया था। पुण्य वस्तुओंके संचयसे सम्पन्न श्रेष्ठ व्यवसायी अपनी दूकानोंसे उन राजमार्गोंकी शोभा बढ़ाते थे। पुरीके चारों ओर सहस्रों सरोवर शोभा दे रहे थे, जो शुद्ध स्फटिकमणिके समान उज्ज्वल तथा पद्मरागमणियोंकी दीप्तिसे देदीप्यमान थे। रत्नमय अलंकारों एवं आभूषणोंसे विभूषित पद्मिनी जातिकी श्रेष्ठ सुन्दरियोंसे वह नगरी शोभायमान थी। वे सब सुन्दरियाँ सुस्थिर यौवनसे युक्त थीं और श्रीकृष्ण-दर्शनकी लालसासे मुँह ऊपर उठाये अपलक नेत्रोंसे राजमार्गकी ओर देख रही थीं। उनके हाथोंमें अक्षतपुञ्ज थे। असंख्य रत्ननिर्मित रथ पुरीकी शोभा बढ़ाते थे। अनेक प्रकारके विचित्र भूषणोंसे उन रथोंको विभूषित एवं चित्रित किया गया था। बहुत-से पुष्पोद्यान, जो भाँति-भाँतिके पुष्पोंसे भरे थे और जिनमें भ्रमर रसास्वादन करते थे, मथुरापुरीकी श्रेयोवृद्धि कर रहे थे। माधुर्य मधुसे युक्त, मधुलोभी तथा मधुमत्त मधुकर मधुकरीयोंके समूहसे संयुक्त हो उन उद्यानोंमें आनन्दका अनुभव कर रहे थे। नगरके चारों ओर अनेक प्रकारके दुर्ग थे, जिनके कारण शत्रुओंका वहाँ पहुँचना अत्यन्त कठिन था। रक्षाशास्त्र-विशारद रक्षकोंसे वह पुरी सदा सुरक्षित थी। विश्वकर्माद्वारा श्रेष्ठ एवं विचित्र रत्नोंसे रचित अगणित अट्टालिकाओंसे संयुक्त मथुरानगरी बड़ी मनोहर जान पड़ती थी।

इस प्रकार मथुरापुरीकी शोभा देख आगे बढ़ते हुए कमलनयन श्रीकृष्णने मार्गमें कुब्जाको देखा, जो अत्यन्त जराजीर्ण एवं वृद्धा-सी थी। डंडेके सहारे चलती थी। अत्यन्त झुकी हुई थी और झुर्रियाँ लटक रही थीं। उसकी आकृति रूखी और विकृत थी। वह कस्तूरी और केसर मिला हुआ चन्दनका अनुलेपन लिये आ रही थी, जिसके स्पर्शमात्रसे शरीर सुगन्धित, सुस्निग्ध तथा अत्यन्त मनोहर हो जाता था। उस वृद्धाने शान्त,