ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
by महर्षि वेदव्यास
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Read in contextब्रह्मखण्ड ९१
ब्रह्माजीने कहा—वत्स! भगवान् शंकर तुम्हारे पूर्वजन्मके गुरु हैं और हमारे भी पुरातन गुरु हैं। अतः तुम उन्हीं ज्ञानियोंके गुरु कल्याणदाता शान्तस्वरूप शिवके पास जाओ। वहीं उन पुरातन गुरुसे भगवन्मन्त्रका ज्ञान प्राप्त करके नारायणकी कथा-वार्ता सुनो और शीघ्र ही मेरे घर लौट आओ। शौनक! ऐसा कहकर तीनों लोकोंका धारण-पोषण करनेवाले ब्रह्माजी चुप हो गये और नारदमुनि पिताको भक्तिभावसे प्रणाम करके शिवलोकको चले गये। (अध्याय २४)
नारदजीको भगवान् शिवका दर्शन, शिवद्वारा नारदजीका सत्कार तथा उनकी मनोवाञ्छापूर्तिके लिये आश्वासन
सौति कहते हैं—शौनक! तदनन्तर विप्रवर नारद क्षणभरमें बड़ी प्रसन्नताके साथ शिवके मनोहर धाममें जा पहुँचे। भगवान् शिवका वह अभीष्ट लोक ध्रुवसे एक लाख योजन ऊपर था। त्रिशूलधारी शिवने दिव्य रत्नोंद्वारा उसका निर्माण किया है। आधारशून्य आकाशमें योगबलसे शम्भुद्वारा धारण किया गया वह विचित्र लोक भाँति-भाँतिके दिव्य भवनोंसे सुशोभित है तथा दिन-रात तेजसे उद्भासित होता रहता है। पवित्र अन्तःकरणवाले श्रेष्ठ साधक तथा मुनीन्द्रशिरोमणि महात्माजन ही उस लोकका दर्शन कर पाते हैं।
मुने! वहाँ सूर्य और चन्द्रमाकी किरणें नहीं पहुँच पातीं। परकोटोंके रूपमें प्रकट हुए अत्यन्त ऊँचे, बहुत बढ़े हुए तथा ज्वालाओंसे जगमगाते हुए असंख्य पावक उस लोकको चारों ओरसे घेरकर स्थित हैं। उस श्रेष्ठ धामका विस्तार एक लाख योजन है। उसमें श्रेष्ठ रत्नोंके बने हुए तीन हजार गृह हैं। हीरेके सार-तत्त्वसे बने हुए भाँति-भाँतिके चित्र-विचित्र मनोहर भवन उसकी शोभा बढ़ाते हैं। वहाँ माणिक्य तथा मुक्तामणिके दर्पण हैं। विश्वकर्माने उस लोकको सपनेमें भी नहीं देखा होगा। एकमात्र शिवसेवी महात्माजन ही उसमें कल्पपर्यन्त निरन्तर वास करते हैं। वह शिवलोक करोड़ों-करोड़ों सिद्धों तथा शिव-पार्षदोंसे युक्त है। वहाँ लाखों विकट भैरव निवास करते हैं। सैकड़ों लाख क्षेत्र उसे घेरे हुए हैं।
सुन्दर फूलोंसे भरे हुए मन्दार आदि देववृक्षोंसे वह सदा आवेष्टित है। सुन्दर कामधेनुएँ उस धामकी उसी तरह शोभा बढ़ाती हैं, जैसे सैकड़ों बलाकाएँ आकाशकी। उस लोकको देखकर नारदमुनि मन-ही-मन बड़े विस्मित हुए और सोचने लगे—'जहाँ ज्ञानियों तथा योगियोंके गुरु निवास करते हैं, वहाँ ऐसी विचित्रताका होना क्या आश्चर्य है? यह सृष्टिलोक त्रिलोकीसे अत्यन्त विलक्षण है और भय, मृत्यु, रोग, पीड़ा तथा जरावस्थाको हर लेनेवाला है।
नारदजीने देखा, दूर सभा-मण्डपके मध्य-भागमें शान्तस्वरूप, कल्याणदाता एवं मनोहर शिव विराजमान हैं। उनके पाँच मुख पाँच चन्द्रमाओंके समान आह्लाददायक जान पड़ते हैं। प्रत्येक मुखमें प्रफुल्ल कमलके समान तीन-तीन नेत्र हैं। उन्होंने मस्तकपर गङ्गाजीको धारण कर रखा है तथा उनके भालदेशमें निर्मल चन्द्रमाका मुकुट शोभा पा रहा है। तपाये हुए सुवर्णके समान कान्तिमती पीली जटा धारण करनेवाले दिगम्बर भगवान् शिव उस समय आकाशगङ्गामें उत्पन्न कमलोंके बीज (पद्माक्ष)-की मालासे सानन्द 'श्रीकृष्ण' नामका जप कर रहे थे। उनकी अङ्गकान्ति गौर वर्णकी है, वे अनन्त और अविनाशी हैं। उनके कण्ठमें सुन्दर नील चिह्न शोभा पाता है। वे नागराजके हारसे अलंकृत हैं। बड़े-बड़े योगीन्द्र, सिद्धेन्द्र और मुनीन्द्र उनके