वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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पुनः उसीसे प्रकट होते हैं तथा ब्रह्मकी ही परा प्रकृतिके अन्तर्गत होनेसे
उसीके अंश हैं; इसलिये तो वे परमात्मासे अभिन्न कहलाते हैं और परमात्मा
उनका नियामक है तथा समस्त जीव उनके नियम्य हैं, इस कारण वे उस
ब्रह्मसे भी भिन्न हैं और परस्पर भी। यही मानना युक्तिसंगत है।
तथान्यप्रतिषेधात् ॥ ३ । २ । ३६ ॥
तथा = उसी प्रकार; अन्यप्रतिषेधात् = दूसरेका निषेध किया गया
है, इसलिये भी (यही सिद्ध होता है)।
व्याख्या - श्रुतिमें जगह-जगह परब्रह्म परमात्मासे भिन्न दूसरी
किसी वस्तुकी सत्ताका निषेध किया गया है।* इससे भी यही
सिद्ध होता है कि अपनी अपरा और परा दोनों शक्तियोंसे सम्पन्न
वह परब्रह्म परमात्मा ही नाना रूपोंमें प्रकट हो रहा है। उसकी
दोनों प्रकृतियोंमें नानात्व होनेपर भी उसमें कोई भेद नहीं है।
वह सर्वथा निर्विकार, असंग, भेदरहित और अखण्ड है।
सम्बन्ध - पूर्वोक्त बातको ही सिद्ध करनेके लिये दूसरी युक्ति प्रस्तुत
करते हैं-
अनेन सर्वगतत्वमायामशब्दादिभ्यः ॥ ३ । २ । ३७ ॥
अनेन = इस प्रकार भेद और अभेदके विवेचनसे; आयामशब्दादिभ्यः =
तथा श्रुतिमें जो ब्रह्मकी व्यापकताको सूचित करनेवाले शब्द आदि
हेतु हैं, उनसे भी; सर्वगतत्वम् = उस ब्रह्मका सर्वगत (सर्वत्र व्यापक)
होना सिद्ध होता है।
व्याख्या - 'उस सर्वश्रेष्ठ पुरुषोत्तमसे यह सम्पूर्ण जगत् परिपूर्ण हो रहा
है।' (श्वेता० उ० ३ । ९ तथा ईश० १) 'परम पुरुष वह है जिससे यह समस्त
जगत् व्याप्त है (गीता ८ । २२) इत्यादि श्रुति और स्मृतिके वचनोंमें जो
परमात्माकी सर्वव्यापकताको सूचित करनेवाले 'सर्वगत' आदि शब्द प्रयुक्त
- मनसैवेदमाप्तव्यं नेह नानास्ति किंचन। (क० उ० २ । १ । ११)