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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished486 pages

Page 299 of 486

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Page 299

२९६ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
दर्शयति चाथो अपि स्मर्यते ॥ ३ । २ । १७ ॥
अथो = उक्त कथनके अनन्तर; दर्शयति = श्रुति उसीको अनेक रूपवाला
भी दिखाती है; च = इसके सिवा; स्मर्यते अपि = स्मृतिमें भी उसके सगुण
स्वरूपका वर्णन आया है।
व्याख्या—पूर्वोक्त 'सत्यं ज्ञानमनन्तम्' इस मन्त्रमें आगे चलकर उस
परमात्माको सबके हृदयमें निहित बताया है और उसीसे समस्त जगत्की
उत्पत्तिका वर्णन किया है; (तै० उ० २। १); फिर उसे रस-स्वरूप, सबको
आनन्द देनेवाला (२। ७) और सबका संचालक (२। ८) कहा है। इसलिये
उस श्रुतिको केवल निर्गुणपरक मानना उचित नहीं है। इसी प्रकार स्मृतिमें
भी जगह-जगह उस परब्रह्मके स्वरूपका वर्णन दोनों प्रकारसे उपलब्ध होता
है। जैसे—'जो मुझे अजन्मा, अनादि और लोकमहेश्वर जानता है, वह
मनुष्योंमें ज्ञानी है और सब पापोंसे मुक्त हो जाता है।'१ (गीता १०। ३) 'मुझे
सब यज्ञ और तपोंका भोक्ता, सम्पूर्ण लोकोंका महान् ईश्वर, समस्त प्राणियोंका
सुहृद् जानकर मनुष्य शान्तिको प्राप्त होता है।'२ (गीता ५। २९) 'ऐसे सगुण
रूपवाला मैं केवल अनन्य भक्तिके द्वारा देखा जा सकता हूँ, तत्त्वसे
जाननेमें आ सकता हूँ और मुझमें प्रवेश भी किया जा सकता है।'३ (गीता
११। ५४) श्रीमद्भगवद्गीताके पंद्रहवें अध्यायमें क्षर और अक्षरका लक्षण
बताकर यह स्पष्ट रूपसे कहा गया है कि 'उत्तम पुरुष इन दोनोंसे भिन्न है,
जो कि परमात्मा नामसे कहा जाता है, जो तीनों लोकोंमें प्रविष्ट होकर
१-यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् ।
असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥
२-भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् ।
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥
३-भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन ।
ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परंतप ॥