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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished486 pages

Page 294 of 486

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Page 294

सूत्र ११ ] अध्याय ३ २९१
हृदय आदि जिन-जिन स्थानोंमें परमात्माकी स्थिति बतायी गयी है, उनके
दोषोंसे वह लिप्त होता है या नहीं ? इस जिज्ञासापर कहते हैं—
न स्थानतोऽपि परस्योभयलिंगं सर्वत्र हि॥ ३।२।११॥
स्थानतः=स्थानके सम्बन्धसे; अपि=भी; परस्य=परब्रह्म परमात्माका;
न=किसी प्रकारके दोषसे संसर्ग नहीं होता; हि=क्योंकि; सर्वत्र=सभी वेद-
वाक्योंमें उस ब्रह्मको; उभयलिंगम्=दोनों प्रकारके लक्षणोंसे युक्त अर्थात्
सब प्रकारके दोषोंसे रहित निर्विशेष तथा समस्त दिव्य गुणोंसे सम्पन्न
बताया गया है।
व्याख्या—कठोपनिषद्में कहा है कि 'अणोरणीयान् महतो
महीयानात्मास्य जन्तोर्निहितो गुहायाम्' (क० उ० १।२।२०) 'इस जीवात्माके
हृदयरूप गुहामें रहनेवाला परमात्मा छोटे-से-छोटा तथा बड़े-से-बड़ा है।'
'वह ब्रह्म बैठा हुआ ही दूर चला जाता है, सोता हुआ ही सब ओर चला जाता
है।' (क० उ० १।२।२१) 'वह जीवात्माके साथ उसकी हृदयगुहामें स्थित
है।' (क० उ० १।३।१) 'वह सब धर्मोंसे रहित है।' (क० उ० १।३।
१५) 'भूत और भविष्यका शासक है।' (क० उ० २।१।१२-१३) 'उस परब्रह्ममें
नाना भेद नहीं है।' (क० उ० २।१।११) 'उसके भयसे अग्नि आदि देवता
अपने-अपने कार्योंमें संलग्न रहते हैं।' (क० उ० २।३।३) इसी प्रकार अन्य
श्रुतियोंमें भी जहाँ इसको निर्विशेष कहा है, उसी प्रकरणमें नाना प्रकारके दिव्य
गुणोंसे युक्त भी बताया है (श्वे० उ० ३।१९) तथा जो इसके दिव्य गुण
बताये गये हैं, वे जीव और प्रकृति—इन दोनोंसे विलक्षण हैं। अतः यह भी
नहीं कहा जा सकता कि ये दिव्य गुण जीवात्माके या जड प्रकृतिके हैं अथवा
उपाधिके कारण उस परब्रह्ममें इनका आरोप किया गया है, क्योंकि परब्रह्म
परमात्मा उपाधिसे रहित है। अतः यही सिद्ध होता है कि वह परमात्मा स्वभावसे
ही दोनों प्रकारके लक्षणोंवाला है अर्थात् वह सब प्रकारके दोषोंसे रहित
निर्विशेष तथा समस्त दिव्य गुणोंसे सम्पन्न है, इसलिये सर्वत्र व्याप्त और