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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished486 pages

Page 290 of 486

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Page 290

सूत्र ७ ] अध्याय ३ २८७

फिर स्वप्नमें स्थित हो जाता है; पुनः जगता और फिर स्वप्नावस्थामें चला
जाता है (बृह० उ० ४। ३। १० से १८ तक)। इस प्रकार स्वप्नजगत मानसिक
सुख-दुःखोंका उपभोग करते-करते कभी सुषुप्ति-अवस्था हो जानेपर स्वप्नके
दृश्योंका अभाव हो जाता है। इससे यह सिद्ध होता है कि वे मायामात्र हैं;
क्योंकि बाह्यजगत्का अभाव नहीं होता, उसका कार्य ज्यों-का-त्यों चलता
रहता है तथा जीवात्माका शरीर भी सुरक्षित रहता है; इसलिये उसका सत्
होना सिद्ध होता है। उस समय जीवात्माको इस प्रपंचके उपभोगसे विश्राम
मिलता है तथा शरीर और इन्द्रियोंकी थकावट दूर होती है। वह अवस्था
आनेपर जीवात्माकी स्थिति कैसी और कहाँ रहती है, इस विषयमें श्रुति
कहती है—'जब यह सुषुप्ति-अवस्थाको प्राप्त होता है, तब कुछ भी नहीं
जानता, इसके शरीरमें जो बहत्तर हजार हिता नामकी नाड़ियाँ हृदयसे निकलकर
समस्त शरीरमें व्याप्त हो रही हैं, उनमें फैलकर यह समस्त शरीरमें व्याप्त
हुआ शयन करता है। (बृह० उ० २।१।१९) दूसरी श्रुतिमें ऐसा भी कहा
गया है कि 'जब यह शयन करता हुआ किसी तरहका स्वप्न नहीं देखता,
सब प्रकारसे सुखी होकर नाड़ियोंमें व्याप्त हो जाता है, उस समय इसे कोई
पाप स्पर्श नहीं कर सकते।' (छा० उ० ८। ६। ३) भाव यह है कि उस
समय अज्ञातमें इसके शरीरकी क्रियाद्वारा किसी जीवकी हिंसादि पापकर्म
हो जाय तो वह नहीं लगता। तथा कहीं ऐसा भी कहा है कि 'हे सौम्य! उस
सुषुप्तिके समय यह पुरुष सत्से सम्पन्न होता है।' (छा० उ० ६। ८। १)
एक स्थानपर ऐसा वर्णन आता है कि उस समय परमात्माके स्पर्शको प्राप्त
हुआ यह जीवात्मा न तो बाहरकी किसी वस्तुको जानता है और न शरीरके
भीतरकी ही किसी वस्तुको जान पाता है' (बृह० उ० ४। ३। २१)।
इन सब वर्णनोंसे यही मालूम होता है कि नाड़ियोंका मूल
और इस जीवात्मा तथा परब्रह्म परमात्माका निवासस्थान हृदय है, उसी
जगह सुषुप्तिमें जीवात्मा शयन करता है; इसलिये उसकी स्थिति
हृदयस्थ नाड़ियोंमें और परमात्मामें भी बतायी जा सकती है। इसमें