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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished486 pages

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Page 288

सूत्र ५] अध्याय ३ २८५
हुए दृश्योंको भविष्यमें होनेवाली शुभाशुभ घटनाओंके सूचक बताते हैं।
इससे यह भी सिद्ध होता है कि स्वप्नकी घटना जीवात्माकी स्वतन्त्र रचना
नहीं है, वह तो निमित्तमात्र है; वास्तवमें सब कुछ जीवके कर्मानुसार उस
परमेश्वरकी शक्तिसे ही होता है।
सम्बन्ध — जीवात्मा भी तो ईश्वरका ही अंश है, अतः इसमें ईश्वरके
ज्ञान और ऐश्वर्य आदि गुण भी आंशिक रूपसे होंगे ही। फिर यदि ऐसा मान
लें कि स्वप्नकी सृष्टि जीवात्मा स्वयं करता है तो क्या हानि है? इसपर
कहते हैं—
पराभिध्यानात्तु तिरोहितं ततो ह्यस्य बन्धविपर्ययौ ॥ ३ । २ । ५ ॥
(जीवात्मामें भी ईश्वरके समान गुण हैं) तु=किंतु; तिरोहितम्=छिपे हुए
(आवृत) हैं; पराभिध्यानात्=(अतः) परब्रह्म परमात्माका निरन्तर ध्यान
करनेसे (वे प्रकट हो जाते हैं); हि=क्योंकि; ततः=उस परमात्माके सकाशसे
ही; अस्य=इसके; बन्धविपर्ययौ=बन्धन और उसके विपरीत अर्थात् मोक्ष है।
व्याख्या — जीवात्मा ईश्वरका अंश है; इसलिये यह भी ईश्वरके सदृश
गुणोंवाला है, इसमें कोई भी संदेह नहीं है; परंतु इसके वे सब गुण तिरोहित
हैं—छिपे हुए हैं; इस कारण उनका उपयोग नहीं देखा जाता। उस परब्रह्म
परमेश्वरका निरन्तर ध्यान करनेसे जीवके वे छिपे हुए गुण पुनः प्रकट हो
सकते हैं (श्वे० उ० १।१०)।¹ परमेश्वरकी आराधनाके बिना अपने-आप
उनका प्रकट होना सम्भव नहीं है, क्योंकि इस जीवका अनादिसिद्ध बन्धन
और उससे मुक्त होना उस जगत्कर्ता परमेश्वरके ही अधीन है (श्वे० उ०
६।१६)। इसलिये वह स्वयं स्वप्नकी सृष्टि आदि कुछ नहीं कर सकता।²
१-तस्याभिध्यानाद् योजनात्तत्त्वभावाद् भूयश्चान्ते विश्वमायानिवृत्तिः ॥
२-साधकको चाहिये कि इस रहस्यको समझकर उस परम दयालु, सर्वशक्तिमान्
परब्रह्म परमेश्वरके आश्रित होकर निरन्तर उसका भजन-ध्यान करे और इस बन्धनसे
छुटकारा पानेके लिये भगवान्‌से प्रार्थना करे। इस जगत्-रूप नाटकका सूत्रधार परमेश्वर
जिसको उस प्रपंचसे अलग करना चाहे, वही इससे अलग हो सकता है!