संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
by महर्षि वेदव्यास
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नदीन, नदीनके जयत्सेन, जयत्सेनके संकृति तथा संकृतिके पुत्र महायशस्वी धर्मात्मा क्षत्रवृद्ध हुए। क्षत्रवृद्धका पुत्र सुनहोत्र था। उसके काश, शल और गृत्समद—ये तीन परम धर्मात्मा पुत्र हुए। गृत्समदके पुत्र शौनक थे। शौनकसे शौनकका जन्म हुआ। शलके पुत्रका नाम आर्ष्टिषेण था। उनके काश्य हुए। काश्यके पुत्रका नाम काशिप हुआ। काशिपके दीर्घतपा, दीर्घतपाके धनु और धनुके पुत्र धन्वन्तरि हुए। वे काशीके महाराज और सब रोगोंका नाश करनेवाले थे। उन्होंने भरद्वाजसे आयुर्वेदका अध्ययन करके चिकित्साका कार्य किया और उसके आठ भाग करके शिष्योंको पढ़ाया। धन्वन्तरिके पुत्र केतुमान् हुए और केतुमान्के वीर पुत्र भीमरथके नामसे प्रसिद्ध हुए। भीमरथके पुत्र राजा दिवोदास हुए, जो काशीके सम्राट् और धर्मात्मा थे। दिवोदासके उनकी पत्नी दृषद्वतीके गर्भसे प्रतर्दन नामक पुत्र हुआ। प्रतर्दनके दो पुत्र थे—वत्स और भार्ग। वत्सके पुत्र अलर्क और अलर्कके संनति हुए। अलर्क बड़े ब्राह्मणभक्त और सत्यप्रतिज्ञ थे। संनतिके पुत्र धर्मात्मा सुनीथ हुए। सुनीथके महायशस्वी क्षेम, क्षेमके केतुमान्, केतुमान्के सुकेतु, सुकेतुके धर्मकेतु, धर्मकेतुके महारथी सत्यकेतु, सत्यकेतुके राजा विभु, विभुके आनर्त, आनर्तके सुकुमार, सुकुमारके धर्मात्मा धृष्टकेतु, धृष्टकेतुके राजा वेणुहोत्र और वेणुहोत्रके पुत्र राजा भार्ग हुए। प्रतर्दनके जो वत्स और भार्ग नामक दो पुत्र बतलाये गये हैं, उनमें वत्सके वत्सभूमि और भार्गके भार्गभूमि नामक पुत्र हुए थे। काश्यके कुलमें ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यजातिके हजारों पुत्र हुए। अब नहुषकी संतानोंका वर्णन सुनो।
नहुषके उनकी पत्नी पितृकन्या विरजाके गर्भसे पाँच महाबली पुत्र हुए, जो इन्द्रके समान तेजस्वी थे। उनके नाम ये हैं—यति, ययाति, संयाति, आयाति तथा याति। उनमें यति ज्येष्ठ थे। उनके बाद ययाति उत्पन्न हुए थे। यतिने ककुत्स्थकी कन्या गौसे विवाह किया था। वे मोक्षधर्मका आश्रय ले ब्रह्मस्वरूप मुनि हो गये। उन पाँच भाइयोंमें ययातिने इस पृथ्वीको जीतकर शुक्राचार्यकी पुत्री देवयानी तथा असुर-कन्या शर्मिष्ठाको पत्नीरूपमें प्राप्त किये। देवयानीने यदु और तुर्वसुको जन्म दिया तथा वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठाने द्रुह्यु, अनु तथा पूरु नामक पुत्र उत्पन्न किये। ययातिपर प्रसन्न हो इन्द्रने उन्हें अत्यन्त प्रकाशमान रथ प्रदान किया। उसमें मनके समान वेगशाली दिव्य अश्व जुते हुए थे। ययातिने उस श्रेष्ठ रथके द्वारा छः रातोंमें ही सम्पूर्ण पृथ्वी तथा देवताओं और दानवोंको भी जीत लिया। वे युद्धमें शत्रुओंके लिये दुर्धर्ष थे। समुद्र और सातों द्वीपोंसहित समूची पृथ्वीको अपने अधिकारमें करके उन्होंने उसके पाँच भाग किये और उन्हें अपने पाँचों पुत्रोंमें बाँट दिया। तत्पश्चात् एक दिन उन्होंने यदुसे कहा—‘बेटा! कुछ आवश्यकतावश मुझे तुम्हारी युवावस्था चाहिये। तुम मेरा बुढ़ापा ग्रहण करो और मैं तुम्हारे रूपसे तरुण होकर इस पृथ्वीपर विचरूँगा।' यह सुनकर यदुने उत्तर दिया—'राजन्! बुढ़ापेमें खान-पान-सम्बन्धी बहुत-से दोष हैं। अतः मैं उसे नहीं ले सकता। आपके अनेक पुत्र हैं, जो मुझसे भी बढ़कर प्रिय हैं। अतः युवावस्था ग्रहण करनेके लिये किसी दूसरे पुत्रको बुलाइये।'
ययाति बोले—ओ मूर्ख! मेरा अनादर करके तेरे लिये कौन-सा आश्रम है? अथवा किस धर्मका विधान है? मैं तो तेरा गुरु हूँ, फिर मेरी बात क्यों नहीं मानता?
यों कहकर ययातिने कुपित हो यदुको शाप दिया—‘ओ मूर्ख! तेरी संततिको कभी राज्य नहीं