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संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished434 pages

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Page 32

३० * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

किया जा सके तो वैसे उग्र स्वभावका पौत्र भले ही हो जाय, पुत्र वैसा कदापि न हो।' तब मुनिने अपने तपोबलसे वैसा ही करनेका आश्वासन देते हुए सत्यवतीके प्रति प्रसन्नता प्रकट की और कहा—'सुन्दरि! पुत्र अथवा पौत्रमें मैं कोई अन्तर नहीं मानता। तुमने जो कहा है, वैसा ही होगा।' तत्पश्चात् सत्यवतीने भृगुवंशी जमदग्निको जन्म दिया, जो तपस्यापरायण, जितेन्द्रिय तथा सर्वत्र समभाव रखनेवाले थे। सत्यवती भी सत्यधर्ममें तत्पर रहनेवाली पुण्यात्मा स्त्री थी। वही कौशिकी नामसे प्रसिद्ध महानदी हुई। इक्ष्वाकुवंशमें रेणु नामके एक राजा थे। उनकी कन्याका नाम रेणुका था। रेणुकाको कामली भी कहते हैं। तप और विद्यासे सम्पन्न जमदग्निने रेणुकाके गर्भसे अत्यन्त भयङ्कर परशुरामजीको प्रकट किया, जो समस्त विद्याओंमें पारङ्गत, धनुर्वेदमें प्रवीण, क्षत्रिय-कुलका संहार करनेवाले तथा प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी थे। ऋचीकके सत्यवतीसे प्रथम तो ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ जमदग्नि हुए। मध्यम पुत्र शुनःशेप और कनिष्ठ पुत्र शुनःपुच्छ थे। कुशिकनन्दन गाधिने विश्वामित्रको पुत्ररूपमें प्राप्त किया, जो तपस्वी, विद्वान् और शान्त थे। वे ब्रह्मर्षिकी समानता पाकर वास्तवमें ब्रह्मर्षि हो गये। धर्मात्मा विश्वामित्रका दूसरा नाम विश्वरथ था। विश्वामित्रके देवरात आदि कई पुत्र हुए, जो सम्पूर्ण विश्वमें विख्यात थे। उनके नाम इस प्रकार बतलाये जाते हैं—देवरात, कात्यायन गोत्रके प्रवर्तक कति, हिरण्याक्ष, रेणु, रेणुक, सांकृति, गालव, मुद्गल मधुच्छन्द, जय, देवल, अष्टक, कच्छप और हारीत—ये सभी विश्वामित्रके पुत्र थे। इन कौशिकवंशी महात्माओंके प्रसिद्ध गोत्र इस प्रकार हैं—पाणिनि, बभ्रु, ध्यानजप्य, पार्थिव, देवरात, शालङ्कायन, बाष्कल, लोहितायन, हारीत और अष्टकाद्याजन। इस वंशमें ब्राह्मण और क्षत्रियका सम्बन्ध विख्यात है। विश्वामित्रके पुत्रोंमें शुनःशेप सबसे बड़ा माना गया है; यद्यपि उसका जन्म भृगुकुलमें हुआ था, तथापि वह कौशिक गोत्रवाला हो गया। हरिश्चन्द्रके यज्ञमें वह पशु बनाकर लाया गया था, किन्तु देवताओंने उसे विश्वामित्रको समर्पित कर दिया। देवताओंद्वारा प्रदत्त होनेके कारण वह देवरात नामसे विख्यात हुआ। देवरात आदि विश्वामित्रके अनेक पुत्र थे। विश्वामित्रकी पत्नी दृषद्वतीके गर्भसे अष्टकका जन्म हुआ था। अष्टकका पुत्र लौहि बताया गया है। इस प्रकार मैंने जह्नुकुलका वर्णन किया। इसके बाद महात्मा आयुके वंशका वर्णन करूँगा।

आयु और नहुषके वंशका वर्णन, रजि एवं ययातिका चरित्र

**लोमहर्षणजी कहते हैं—**आयुके उनकी पत्नी स्वर्भानुकुमारी प्रभाके गर्भसे पाँच पुत्र उत्पन्न हुए। वे सभी वीर और महारथी थे। सर्वप्रथम नहुषका जन्म हुआ। उनके बाद वृद्धशर्मा उत्पन्न हुए। तत्पश्चात् क्रमशः रम्भ, रजि तथा अनेना हुए। ये तीनों लोकोंमें विख्यात थे। रजिने पाँच सौ पुत्रोंको जन्म दिया। वे सभी राजेय क्षत्रियके नामसे विख्यात हुए। उनसे इन्द्र भी डरते थे। पूर्वकालमें देवताओं तथा असुरोंमें भयंकर युद्ध आरम्भ होनेपर दोनों पक्षोंके लोगोंने ब्रह्माजीसे पूछा—'भगवन्! आप सब भूतोंके स्वामी हैं; बताइये, हमारे युद्धमें कौन विजयी होगा? हम इस बातको ठीक-ठीक सुनना चाहते हैं।'

**ब्रह्माजीने कहा—**राजा रजि हथियार हाथमें