Skip to content
SarvaKosh
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished434 pages

Page 207 of 434

Read in context
Page 207
  • पूर्णतीर्थ और गोविन्द आदि तीर्थोंकी महिमा *
    २०५

वे जबतक सूर्य और चन्द्रमाकी सत्ता रहती है तबतक नरकमें पड़े रहते हैं।'

भरद्वाजने कहा—यह मेरी बहिन अभी कुमारी है; इसको विधिपूर्वक ग्रहण करो और पत्नी बनाओ। इसके प्रति प्रेमपूर्ण बर्ताव करना, यही मैं दक्षिणा माँगता हूँ।

कठने 'बहुत अच्छा' कहकर गुरुके आदेशसे विधिपूर्वक दी हुई रेवतीका पाणिग्रहण किया और उसके सुन्दर रूपकी प्राप्तिके लिये वहीं रहकर देवेश्वर शङ्करकी आराधना की। रेवतीने भी शिवकी प्रसन्नताके लिये उनका पूजन किया। इससे वह सुन्दर रूपवती हो गयी। उसका प्रत्येक अङ्ग मनोहर दिखायी देने लगा। अब उसके रूपकी कहीं समता नहीं थी। वहाँ रेवतीके स्नान करनेसे जो जलकी धारा प्रकट हुई, वह 'रेवती' नामकी नदी हुई, जो रूप और सौभाग्य प्रदान करनेवाली है। फिर कठने उसकी पुण्यरूपताकी सिद्धिके लिये नाना प्रकारके दर्भो (कुशों)-से अभिषेक किया। इससे 'विदर्भा' नामकी नदी प्रकट हुई। जो मनुष्य रेवती और गङ्गामें श्रद्धापूर्वक स्नान करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है। इसी प्रकार जो विदर्भा और गौतमीके संगममें स्नान करता है, उसे तत्काल भोग और मोक्षकी प्राप्ति होती है। वहाँ दोनों तटोंपर सौ उत्तम तीर्थ हैं, जो सब पापोंके नाशक तथा सम्पूर्ण सिद्धियोंके दाता हैं।


पूर्णतीर्थ और गोविन्द आदि तीर्थोंकी महिमा, धन्वन्तरि और इन्द्रपर भगवान्‌की कृपा

**ब्रह्माजी कहते हैं—**गौतमी गङ्गाके उत्तर-तटपर पूर्णतीर्थ है। वहाँ यदि मनुष्य अनजानमें नहा ले तो भी कल्याणका भागी होता है। पूर्णतीर्थके माहात्म्यका वर्णन कौन कर सकता है, जहाँ स्वयं चक्रधारी भगवान् विष्णु और पिनाकधारी भगवान् शंकर निवास करते हैं। पूर्वकालमें आयुके पुत्र धन्वन्तरि राजा थे। उन्होंने अश्वमेध आदि अनेक प्रकारके यज्ञोंका अनुष्ठान किया, भाँति-भाँतिके दान दिये तथा प्रचुर भोग भोगे। फिर भोगोंकी विषमताका अनुभव करके उन्हें बड़ा वैराग्य हुआ। धन्वन्तरि यह जानते थे कि पर्वतके शिखरपर, गङ्गा नदीके किनारे, समुद्रके तटपर, शिव और विष्णुके मन्दिरमें अथवा विशेषतः किसी पवित्र संगमपर किया हुआ जप, तप, होम—सब अक्षय होता है; इसलिये उन्होंने गङ्गा-सागर-संगमपर भारी तपस्या आरम्भ की।

एक बार राजा धन्वन्तरिने राज्य करते समय एक महान् असुरको रणभूमिसे मार भगाया था। उसका नाम था तम। वह एक हजार वर्षोंतक राजाके भयसे समुद्रमें छिपा रहा। जब उसे मालूम हुआ कि राजा धन्वन्तरि विरक्त होकर वनमें चले आये हैं और उनका पुत्र राज्यसिंहासनपर आसीन हुआ है, तब वह समुद्रसे निकला और उस स्थानपर आया, जहाँ महाराज धन्वन्तरि गङ्गातटका आश्रय ले जप और होममें संलग्न तथा ब्रह्मचिन्तनमें तत्पर थे। उसने सोचा—'इस बलवान् राजाने मुझे अनेक बार नष्ट करनेका प्रयत्न किया है, अतः मैं भी क्यों न अपने इस शत्रुको नष्ट कर डालूँ।' ऐसा निश्चय करके उसने मायासे एक स्त्रीका रूप बनाया और राजाके पास आया। वह मायामयी सुन्दरी तरुणी देखनेमें बड़ी मनोहर थी। उसने हँसते हुए नाचना और गाना आरम्भ किया। उस