बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
by नरपति नाल्ह
DevanagariHindipublished315 pages
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घाम चल्या छा भँवर जी ! पोपली जी,
राँणी ढोला ! हो गयी घेर घुमेर ।
बैठौँ की रुत चाल्या चाकरी जी,
ओजी म्हौरा सास सपूती रा पूत ।
मवना सिधारो पूरब को चाकरी जी ॥
[ गुजरात की कोई कन्या ससुराल जा रही है और कहती है—
अमे रे लील़ा वननी चरकलड़ी उड़ो जाशुँ परदेश जी ।
आज रे दादाजीना देशमाँ काले जाशुँ परदेश जी ॥
[ बिहार युक्तप्रान्त और मध्यप्रान्त में आइये, कहीं सुहाग की रात है और
आनन्द में मग्न वधू गा रही है—
आज सोहाग कै रात चन्दा तुम उइहौ ।
चन्दा तुम उइहौ सुरुज मति चइहौ ॥
मोर हिरदा बिरस जनि किहेउ सुरुग मति बोलेउ ।
मोर छतिया बिहरि जनि जाइ तू पह जिनि फाटेउ ॥ '
आजु करहु बड़ी राति चन्दा तुम उइहौ ।
धीरे धीरे चलि भोग सुरुज बिलम करि अइहौ ॥
[ अथवा 'मेघदूत' के संदेशवाहक मेघों की भांति विरहिणी का बादलों द्वारा
पिया के पास संदेश भेजना कितना हृदयस्पर्शी है—
कारिक पियरि बदरिया झिमिकि दैय बरसहु ।
बद्रो जाइ बरसहु उही देस जहाँ पिया फोड़ करै ॥
भीजै आरार बादर सम्भुआ कनकिया ।
अरे भितराँ से हुलसै करेज समुझि घर आवै' ॥
और इन्हीं लोक गीतों के सदृश बीसलदेव रासो के भी पद हैं । रानी
राजमती उलग ( परदेश ) जाते हुए अपने पति से विनय करती है कि वह भी
उनके साथ चलेगी । एकाकी रहना उसके लिये दुसहं है—
हउ न पवीजुं राजा थाकी से बात ।
साधान चालिस्यइ राइ कइ साथ ।
बादली हुइ करि वापरउं !
पाघत सार सिस्वाड डोलिस्या बाइ ॥
उभी पहरइ जागिसिउ ।
अण परि सेविश्यउ आपणउ राय ॥--( पद संख्या ६२-)