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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

by नरपति नाल्ह

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DevanagariHindipublished315 pages

Page 99 of 315

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Page 99
  • १३' -
    घाम चल्या छा भँवर जी ! पोपली जी,
    राँणी ढोला ! हो गयी घेर घुमेर ।
    बैठौँ की रुत चाल्या चाकरी जी,
    ओजी म्हौरा सास सपूती रा पूत ।
    मवना सिधारो पूरब को चाकरी जी ॥
    [ गुजरात की कोई कन्या ससुराल जा रही है और कहती है—
    अमे रे लील़ा वननी चरकलड़ी उड़ो जाशुँ परदेश जी ।
    आज रे दादाजीना देशमाँ काले जाशुँ परदेश जी ॥
    [ बिहार युक्तप्रान्त और मध्यप्रान्त में आइये, कहीं सुहाग की रात है और
    आनन्द में मग्न वधू गा रही है—
    आज सोहाग कै रात चन्दा तुम उइहौ ।
    चन्दा तुम उइहौ सुरुज मति चइहौ ॥
    मोर हिरदा बिरस जनि किहेउ सुरुग मति बोलेउ ।
    मोर छतिया बिहरि जनि जाइ तू पह जिनि फाटेउ ॥ '
    आजु करहु बड़ी राति चन्दा तुम उइहौ ।
    धीरे धीरे चलि भोग सुरुज बिलम करि अइहौ ॥
    [ अथवा 'मेघदूत' के संदेशवाहक मेघों की भांति विरहिणी का बादलों द्वारा
    पिया के पास संदेश भेजना कितना हृदयस्पर्शी है—
    कारिक पियरि बदरिया झिमिकि दैय बरसहु ।
    बद्रो जाइ बरसहु उही देस जहाँ पिया फोड़ करै ॥
    भीजै आरार बादर सम्भुआ कनकिया ।
    अरे भितराँ से हुलसै करेज समुझि घर आवै' ॥
    और इन्हीं लोक गीतों के सदृश बीसलदेव रासो के भी पद हैं । रानी
    राजमती उलग ( परदेश ) जाते हुए अपने पति से विनय करती है कि वह भी
    उनके साथ चलेगी । एकाकी रहना उसके लिये दुसहं है—
    हउ न पवीजुं राजा थाकी से बात ।
    साधान चालिस्यइ राइ कइ साथ ।
    बादली हुइ करि वापरउं !
    पाघत सार सिस्वाड डोलिस्या बाइ ॥
    उभी पहरइ जागिसिउ ।
    अण परि सेविश्यउ आपणउ राय ॥--( पद संख्या ६२-)