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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

by नरपति नाल्ह

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DevanagariHindipublished315 pages

Page 97 of 315

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Page 97

यहाँ पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण (Transcription) प्रस्तुत है:

— ४१ —
इतिहास में—जिसका अधूरा ज्ञान ही आज उपलब्ध है—इसका संकेत अवश्य
मिलता है कि शब्दों का उस काल तक कोई विशेष महत्त्व नहीं था तथा विषय-
विधान का विकास भी नहीं हो सका था । भाषा ऐसी अवस्था में थी जिसमें
भावप्रकाशन की क्षमता न्यून थी और भावप्रकाशन के विस्तार के लिये भाषा
के साथ वाद्य यन्त्रों की सहायता अपेक्षित थी । वाद्य यन्त्र भी अपने पूर्ण विक-
सित रूप में न थे वरन् साधारण वाद्य यन्त्र ही काम में आते थे । इस काल के
प्राप्त काव्य यह भी सिद्ध करते हैं कि इस काल तक सामूहिक और वैयक्तिक
भावना में अधिक अन्तर न आ सका था । अस्तु, इसके द्वारा कुछ अंशों में यह
निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि काव्य में प्रकट किये गये मनुष्यों की भाव-
नाओं से अधिक प्रभावित उनके संगीतात्मक रूप से होता रहा होगा क्योंकि
समाज की अविकसित अवस्था में मनुष्य के लिये काव्य में प्रकट की हुई भावनाओं
को समझना सहज सम्भव नहीं । स्वर सम संगीत की उत्पत्ति जिसका—उल्लेख
ऊपर किया गया है—वहीं से मानी जा सकती है । काव्य के इसी संगीतात्मक
स्वरूप का विकास होता रहा और क्रमशः इसकी दो शाखायें हो गयीं । एक शाखा
का विकास संगीत के शास्त्रीय विधान के रूप में हुआ और दूसरी का काव्य के
रूप में । काव्य में संगीतात्मकता और चित्रात्मकता दोनों का सामञ्जस्य और
सन्तुलन ही चूँकि उसमें जीवन डाल देता है, इसलिये कवि की सफलता भी
दोनों के सामञ्जस्य और समन्वय उपस्थित करने में ही है। ऐसे काव्य का जो
अपने प्रारम्भिक काल में अवश्य लोक गीतों के रूप में रहे होंगे, नमूना अब प्राप्त
नहीं है । आज तो लोकगीतों का वही नमूना मिलता है जहाँ संगीत (शास्त्रीय
संगीत) और गीत का अन्तर स्पष्ट होने लगता है । संगीत में जहाँ शास्त्रीय
विधान की रक्षा का आग्रह होता है वहाँ लोकगीतों में भावुकता और आत्मा-
भिव्यञ्जना का । विद्वानों के मतानुसार लोकगीत और संगीत के तीन प्रधान
अन्तर हैं ।
संगीत | लोक गीत
(१) संगीत में शब्दों का महत्त्व नगण्य है | (१) लोक गीतों में शब्द केवल स्वर के
वे केवल स्वर के विस्तार और संकोच | विस्तार और संकोच के लिये
के लिये आते हैं । स्वर प्रवाह ही | नहीं आते वरन् अर्थ की परिधि
उनका प्रधान लक्ष्य है । अर्थ की | को विस्तृत भी करते हैं ।
परिधि को केवल स्पर्श मात्र करते हैं ।