बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
by नरपति नाल्ह
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Read in context~ ६६ ~
हुई कि 'बारह सौ बहोत्तर' का अर्थ १२१२ लगाया¹ । लेकिन उनके इन दोनों
तर्कों में से प्रथम तर्क का खण्डन निम्नलिखित विद्वानों ने इस प्रकार किया है ।
प्रसिद्ध विद्वान श्री गौरीशंकर हीराचन्द ओझा ने इसका खण्डन करते हुए कहा
है कि भाषा का प्रयोग कवि की रुचि पर निर्भर है । जैनों के धर्मग्रन्थ प्राकृत
भाषा में होने के कारण जैन लेखक अपने काव्यों में प्राकृत शब्दों की भरमार
करते रहे हैं। जिससे उनकी भाषा दुरूह हो गयी है । चारण, भाट आदि प्राकृत
से अधिक परिचित न होने के कारण अपनी रचनाएँ प्रचलित भाषा में करते थे,
जिससे इन दोनों प्रकार के लेखकों की पुस्तकों की भाषा में अन्तर होना स्वाभा-
विक ही है । भाषा की कसौटी सदियाँ नहीं है । एक ही समय में कोई सरल
भाषा में अपनी रचना करता है तो कोई कठिन भाषा का प्रयोग करता है² ।
डा० उदयनारायण तिवारी ने भी ओझा जी के मत को पुष्ट किया है³ और
यह भी कहा है कि जहाँ तक क्रियाओं का सम्बन्ध है अनेक ग्रन्थ ऐसे मिलते हैं
जिनमें समकालीन न होने पर भी वर्तमानकालिक क्रियाओं का प्रयोग मिलता
है । प्रायः घटनाओं को सत्य का रूप देने के लिये ही कवियों ने ऐसा किया है ।
श्री वर्मा जी का दूसरा तर्क जिसका उल्लेख ऊपर किया जा चुका है कुछ
हद तक ठीक है क्योंकि वि० सं० १२१२ की गणना करने पर जेठ बदी नवमी को
बुधवार पड़ता है । लेकिन इस तिथि और संवत् का ठीक मानने का यह अर्थ
नहीं कि इस रासो के रचयिता ने बीसलदेव चतुर्थ के समय-ध में कहा है और
ग्रन्थ का नायक विग्रहराज चतुर्थ है क्योंकि ग्रन्थ से पायी गयी कथा इस बीसल-
देव से सम्बन्धित नहीं है वरन् ऐतिहासिक आधार पर कथा का सम्बन्ध तृतीय
बीसलदेव से है ।
अस्तु, उपर्युक्त सभी प्रमाणों द्वारा इस निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है कि
इस ग्रन्थ के रचयिता का प्रादुर्भाव-काल १३वीं शती का पूर्वार्द्ध था । उसकी
भाषा प्राचीन थी अर्थात् ११००-१२०० वि० सं० की थी तथा उसके ग्रन्थ के
नायक थे बीसलदेव । तृतीय अन्त साक्ष्य के अभाव में जहाँ कवि के प्रादुर्भाव-काल
का निर्णय करना जटिल है वहीं उसकी रचना में यत्र तत्र उसके नाम के उल्लेख
के कारण यह सिद्ध होता है कि इस रासो की रचना करने वाला कोई नरपति
१—बीसलदेव रासो—पृ० ७ ।
२—नागरीप्रचारिणी पत्रिका—स० १८६५ पृ० १०१ ।
३—वीर काव्य पृ० २०० ।