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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

by नरपति नाल्ह

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DevanagariHindipublished315 pages

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Page 71

– १४ –
राजमती के शुभ शकुनों को सत्य प्रमाणित करता हुआ अजमेर पहुँच जाता है
और राजमती को राजा का पत्र देता है। पत्र को राजमती गले से लगा लेती है
और योगी को अच्छे भोजन आदि कराकर अपने प्रियतम की बातें पूछती है। योगी
रानी को आज के तीसरे दिन राजा के अजमेर पहुँचने का शुभ समाचार देता
है और अनेक प्रकार से रानी द्वारा पुरस्कृत होकर अपने स्थान को लौटता है।
योगी के कथनानुसार राजा बीसलदेव तीसरे दिन अजमेर लौटता है।
अजमेर में उस दिन बड़ी खुशियाँ मनायी जाती हैं। रानी राजमती के हर्ष की
कोई सीमा नहीं रहती और वह यह सोचकर अपने मन में और भी हर्षित होती
है कि पति के प्रवास की इस लम्बी अवधि में उसे कोई कलंक नहीं लगा जो
कि इस यौवन और बढ़ती हुई विरह ज्वाला में लगना बहुत सहज और स्वाभा-
विक था। कवि इसके पश्चात् कुछ पंक्तियों में प्रेम और प्रेमिका की उन
दशाओं तथा बातों का वर्णन बड़े स्वाभाविक रूप से करता है जो प्रायः लम्बी
अवधि के प्रवास के पश्चात् प्रेमी और प्रेमिका में होती हैं। अन्तिम पंक्तियों में
कवि यह शुभकामना प्रकट करते हुए कि जिस प्रकार रानी राजा से मिली उसी
प्रकार संसार में सभी मिलें ग्रन्थ समाप्त करता है।
प्रथम रूपान्तर की कथा उपर्युक्त स्थान पर शेष हो जाती है। लेकिन
द्वितीय रूपान्तर में इसके पश्चात् चतुर्थ खण्ड की कथा प्रारम्भ होती है। इस
खण्ड में कवि हनुमान की वन्दना करके धार नगरी से राजा भोज का आना
वर्णन करता है। बीसलदेव के अजमेर पहुँचने पर उसका भतीजा राजा बीसलदेव
का स्वागत करता है। राजा उसे युवराज के पद पर स्थापित कर चित्तौड़ में उसे
रहने का स्थान देता है। फिर राजा भोज को अजमेर आने के लिये पुरोहित के
हाथ निमन्त्रण भेजता है। राजा भोज बीसलदेव के निमन्त्रण पर अजमेर आता
है। दोनों राजा मिलकर अतीव प्रसन्न होते हैं। अजमेर में भी आनन्द मनाया
जाता है। राजा भोज कुछ दिनों तक अजमेर में रहकर अपनी राजधानी को
लौट जाता है, और राजमती को अपने साथ ले जाता है। तीन महीने पश्चात्
फिर रानी राजमती को लेने बीसलदेव धार जाता है और रानी को लेकर वापस
लौटता है। चतुर्थ खण्ड की कथा कवि यहीं पर यह आशीर्वाद देकर समाप्त
करता है कि "जब तक पृथ्वी पर सूर्य उदय होते रहें, जब तक गंगा में जल
प्रवाहित होता रहे, जबतक पृथ्वी पर जगन्नाथ रहें, तबतक राजा तुम अजमेर
पर अविच्छन्न राज्य करते रहो।"