Skip to content
SarvaKosh
बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

by नरपति नाल्ह

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished315 pages

Page 63 of 315

Read in context
Page 63
  • ५२ -
    वि० सं० १२२५ में जो साठ बीसलदेव चतुर्थ की मृत्यु के प्रायः पाँच या
    छ वर्षों पश्चात् आता है, पृथ्वी भट ने अमर गांगेय से राज्य छीना। ऊपर
    कहा जा चुका है कि बीसलदेव चतुर्थ की मृत्यु सं० १२२० में हुई। अतः
    १२२१ से लेकर १२२५ तक अमर गांगेय ने राज्य किया और तब पृथ्वीभट
    ने उससे राज्य छीना। इसमें संदेह नहीं कि राजगद्दी पर बैठने के समय अमर
    गांगेय नाबालिग था लेकिन उसका जन्म ही १२१२ में नहीं हुआ था यह
    कैसे माना जा सकता है। कल्पना के आधार पर यह कहना कि बीसलदेव
    चतुर्थ सं० १२०७ या १२०८ में उड़ीसा विजय करने गया और सं० १२१२ में
    वहाँ से लौटा ठीक नहीं है क्योंकि बीसलदेव चतुर्थ का समय १२१० से १२२०
    तक था। यदि किसी भी रूप में यह मान लिया जाय कि बीसलदेव उड़ीसा गया
    था तब भी यह मानना पड़ेगा कि उसका उड़ीसा गमन निश्चय ही सं० १२१०
    से लेकर १२२० के भीतर हुआ होगा। ऊपर कहा जा चुका है कि राजगद्दी पर
    बैठने के समय बीसलदेव चतुर्थ का पुत्र अमर गांगेय नाबालिग था। यदि
    उसकी नाबालिगी की अवस्था राजगद्दी पर बैठने के समय दस वर्ष की भी
    मान ली जाय तो भी यही बात सिद्ध होती है कि उसका जन्म बीसलदेव के
    उड़ीसा गमन के समय तक हो चुका था। ऐसी स्थिति में बीसलदेव का अपने
    पुत्र को राजगद्दी न सौंप कर भतीजे को राजगद्दी सौंप कर जाने की बात की
    कल्पना केवल कवि कल्पना मात्र है। फिर बीसलदेव चतुर्थ द्वारा उड़ीसा गमन
    के समय अपने भतीजे अर्थात् जगदेव के पुत्र पृथ्वीभट को राज्य सौंपने के बात
    यों भी खरी नहीं उतरती कि जिस बीसलदेव ने अपने पिता की हत्या करने
    वाले अपने भाई जगदेव से राज्य छीन लिया था और उसे देश निकाला कर
    दिया था वही बीसलदेव उसको या उसी के पुत्र को क्योंकर राज्य सौंप
    सकता था।
    बीसलदेव रासो के दोनों रूपान्तरों में समान भाव से यह कथा पाई जाती
    है कि बीसलदेव उड़ीसा जाने के पूर्व राजमती से बातचात करते समय उसे
    बारह वर्ष की गोरी कह कर सम्बोधित करता है। इस कथा का सम्बन्ध यद्यपि
    इतिहास से विशेष नहीं है फिर भी ऐतिहासिक रंग चढ़ाने के हेतु श्री सत्य
    जीवन जी वर्मा ने 'बारह बरस की गोरड़ी' का अर्थ युवती स्त्री से न लगाकर
    यह माना है कि राजमती की अवस्था ब्याह के समय अष्टप् अर्थात् बारह वर्ष
    की थी क्योंकि 'हिन्दुओं में उस समय अधिकतर लोग 'अष्टवर्षा भवेद् गौरी