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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

by नरपति नाल्ह

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DevanagariHindipublished315 pages

Page 60 of 315

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Page 60
  • ५३ -
    विद्वानों के मतानुसार करीब १५० वर्षों के पश्चात् की जब अजमेर बस चुका
    था इसलिये उसने अजमेर का उल्लेख कर दिया लेकिन बीसलदेव को सर्वदा
    सांभरीराज ही कहा। सांभीरीराज कह कर कवि ने यह संकेत किया कि उसका
    उद्ददेश्य 'सपाद लक्ष' के राजा से है जिसमें नागौर आदि के प्रान्त और बहुत
    संभव है कि यह स्थान भी, जिसे बीसलदेव के वंशज अजयराज (अजयदेव) ने
    बसा कर उसका नाम अजमेर रखा, सम्मिलित रहा हो। और इसीलिये कवि ने
    शायद अपने काल के प्रचलित नाम अजमेर को लिखना विशेष उचित समझा
    इसके बदले कि उसके काल से डेढ़ सौ वर्ष पुराने नाम को वह लिखे। अथवा
    यह भी संभव है कि उस पुराने नाम से कवि परिचित ही न रहा हो।
    दोनों रूपान्तरों में समान रूप से पायी जानेवाली घटनाओं में से दूसरी
    घटना राजा बीसलदेव की उड़ीसा यात्रा की है जिस पर ऐतिहासिक रूप से
    विचार किया जा सकता है। बीसलदेव तृतीय को ग्रन्थ के नायक मानने वाले
    विद्वानों ने इस घटना को कवि की कल्पना माना है क्योंकि इतिहास में या कहीं
    भी बीसलदेव तृतीय के उड़ीसा विजय करने का प्रमाण नहीं मिलता। लेकिन
    बीसलदेव चतुर्थ के पक्ष के समर्थकों का कहना है कि चूंकि विग्रहराज चतुर्थ के तीर्थ
    यात्रा के प्रसंग में विन्ध्याचल से लेकर हिमालय तक के देशों को विजय करने का
    उल्लेख 'भारत के प्राचीन राजवंश' में मिलता है, इसलिये कवि नाल्ह के
    ग्रन्थ का नायक बीसलदेव चतुर्थ है।
    किन्तु इस प्रमाण में कितना सत्य का अंश है यह कहना कठिन है। डा०
    सत्यजीवन वर्मा ने इसी प्रमाण को आधार मान कर इस प्रसंग से सम्बन्धित
    बीसलदेव की भावज की इस बात को कि "वह बीसलदेव उड़ीसा जाने के पूर्व
    भी सात वरस बाहर रहा था और इस प्रकार वह जन्म भर बाहर ही रहता है"
    असत्य एवं असम्भव न मानते हुए कहा है कि चूंकि बीसलदेव चतुर्थ अपनी
    वीरता और युद्ध कौशल ही के कारण अपने भाई का उत्तराधिकारी बनाया
    गया था इसलिए युद्धार्थ उसका सात वर्ष तक एक बार बाहर रहना असम्भव
    नहीं। इसमें तो संदेह नहीं बीसलदेव चतुर्थ, जिसका राजस्व काल वि० स०
    १२१० से (क्योंकि इस समय का उसका लिखा हरकेलि नाटक मिलता है)
    वि० स० १२२० तक माना जाता है, बड़ा पराक्रमी था। दिल्ली के फीरोज़
    १- भारत के प्राचीन वंश-पृ० २४४ ।
    २- बीसलदेव रासो-सं० सत्यजीवन वर्मा भूमिका-पृ० २० ।