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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

by नरपति नाल्ह

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DevanagariHindipublished315 pages

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Page 292
  • १८६ -

लोगों की भाषा पहाड़ी है। जो राजस्थानी से मिलती-जुलती है, जिससे यह सिद्ध
होता है कि इन स्थानों के रहने वालों के पूर्वज भारतवर्ष से ही आए थे।
हिमालय के कुमायूँ प्रदेश के रहने वाले लोग बड़े लजाधुर प्रकृति के हैं और
वे सभ्य जगत् के लोगों से मिलने-जुलने में बहुत शर्माते हैं। इस प्रकार के लोग
नेपाल के कुछ हिस्सों में भी पाए जाते हैं। लेकिन उनके सम्बन्ध में विशेष
नहीं कहा जा सकता।
व्यापारिक दृष्टि से हिमालय में उत्पन्न होने वाले अनाजों का कोई विशेष
स्थान नहीं है। चावल, गेहूँ, जौ और मडुआ यहाँ की मुख्य उपज है। आलू
की खेती भी कुमायूँ प्रदेश में होता है। कुल्लू प्रदेश में सेब, पीच आदि फल
भी सफलतापूर्वक उपगाये जाते हैं। हिमालय के इन प्रदेशों में खेती वर्ष में
केवल एक बार ही हो सकती है। चाय के बगीचे १६ वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में
कुमायूँ प्रदेश में अधिकता से लगाये गए थे लेकिन इस शताब्दी के उत्तरार्द्ध
में ये बगीचे कागड़ा और दार्जिलिंग की सम्पत्ति हो गये हैं। दार्जिलिंग में
'कुनाइन' बनाने के लिये सिनकोना की भी खेती होती है।
हिमालय की तराई में शाल, सीसम, देवदार, चीड़ आदि के जंगल
बहुत पाए जाते हैं तथा पूर्वी हिमालय में जगली रबर भी पाया जाता है जो कि
'असम' में बिक्री हेतु आता है।
हिमालय का पुराना नाम 'हेमवात', 'हिमवान्', 'हिमाचल' 'हिमवत्प्रदेश',
'हिमाद्रि' तथा 'हिमवात' है। कालिका पुराण में इसका उल्लेख पर्वतराज तथा
कुमारसम्भव में 'नगाधिराज' के नाम से हुआ है। महाभारत के वनपर्व में
लिखा है कि हिमवात प्रदेश नेपाल के ठीक पश्चिम दिशा की ओर बसा हुआ
है और यह गंगा, यमुना, सतलज आदि नदियों का उद्गम स्थान है। 'मा
र्कण्डेय पुराण, 'महाभारत' तथा 'कुमारसम्भव' के अनुसार यह पहाड़ एक
समुद्र से दूसरे समुद्र तक 'कार्मुकस्य यथा गुणा.' के समान फैला हुआ है।
'कुणालजातक' के अनुसार हिमालय प्रदेश का प्रसार ऊँचाई में ५०० लोग
तथा चौड़ाई में ३००० लीग माना गया है। कैलास, जिनका उल्लेख संस्कृत
साहित्य में अनेक स्थलों पर है, हिमालय पर्वत श्रेणी के मध्य भाग के उत्तर में
स्थित है। बौद्ध ग्रन्थों में हिमालय के सात बड़ी-बड़ी झीलों का उल्लेख मिलता
है। उनके नाम हैं-अरावणमुण्ड, रवशर, छदन्त, कुणाल, मन्दाकिनी, अनोतत्त
तथा सीहप्पपात। महाभारत के सभापर्व और वनपर्व के अनुसार 'मैनाक' पर्वत
भी हिमालय का एक हिस्सा था जो कैलास के समीप स्थित था।