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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

by नरपति नाल्ह

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DevanagariHindipublished315 pages

Page 283 of 315

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Page 283
  • १८० -

लेकिन द्वितीय अजयदेव के पहले ही अजमेर की स्थापना हो चुकी थी।
इसका प्रमाण थड़ा ( Thadas ) तथा छत्री ( Chhatrees ) के जैन शिला-
लेखों से मिलता है। अजमेर के भट्टारक रतनकीर्ति के शिष्य हेमराज की समाधि
पर बनी हुई छत्री पर सं० ८१७ (सन् ७६०) का लिखा हुआ लेख तथा
इसी प्रकार का लेख यहाँ बनी हुई अन्य तीन छत्र्रियों पर सन् ८८५, ८५४
तथा ८७१ यह सिद्ध करते हैं कि यह नगर अजयदेव द्वितीय के पहले बस
चुका था क्योंकि ये तिथियाँ उक्त अजयदेव के बहुत पहले की हैं।
अजमेर की प्राग् ऐतिहासिक कथा से ज्ञात होता है कि अग्निकुल से उत्पन्न
होने वाले अन्तिम छत्री चौहानों का यह राज्य था। प्रथम चौहान अन्हल के
वंश में उत्पन्न राजा 'अज' ने सन् १४५ मे इसे बसाया था। इससे पहले राजा
अज ने 'नाग पहाड़' पर एक किला निर्मित कराना चाहा लेकिन किसी राक्षस
के उत्पात के कारण दिन मे बनवाई गई किले की दीवारें रात में नष्ट हो
गईं। अतः अज ने आजकल के प्रसिद्ध तारागढ़ पहाड़ी पर उस किले को
बनवाया। यह किला गढ़ बीटली के नाम से और इन्द्रकोट पर उनके द्वारा
बनवाया हुआ नगर अजमेर के नाम से प्रसिद्ध हुए। ये राजा अज इतिहास में
अजयपाल के नाम से प्रसिद्ध हैं। कर्नल टाड ने इस नाम के साथ एक दन्त-
कथा का उल्लेख करते हुए लिखा है कि अजयपाल का नाम अजयपाल इसलिए
पड़ा था कि ये पहले अजों (बकरियों) की रक्षा करते थे और उनको यह राज्य
पुष्कर के किसी महात्मा ने वरदान-स्वरूप उनकी बकरियों का दूध पीने के
कारण दिया था। उनका नाम ही शायद इस दन्तकथा की उत्पत्ति का कारण
है। इस दन्तकथा में सत्य का अंश कितना है यद्यपि कहा नहीं जा सकता
तथापि राजा अजयपाल का अपने जीवन के अन्तिम काल में अजमेर से १०
मील की दूरी पर जाकर पहाड़ियों में रहना और वहीं आजकल भी अजयपाल
के मन्दिर का होना यही सिद्ध करता है कि उपर्युक्त दन्तकथा में सत्य का
अंश कुछ अवश्य है।
इसके पश्चात् चौहानों के वंशजों की जो कथाएँ प्रचलित हैं वे सब इति
हास से सम्बन्धित हैं। दोलराय की मृत्यु सन् ६८५ में मुसलमान लुटेरों से
अपने नगर की रक्षा करते हुए हुई। उसके उत्तराधिकारी मानिकराव ने
'सांभर' की स्थापना की और इसके बाद ही चौहान राजा 'सभरी राव' कहलाने
लगे। इनके राज्य काल से सन् १०२४ तक का क्रमिक इतिहास अन्धकारमय
है। सन् १०२४ में अवश्य सुल्तान महमूद प्रसिद्ध सोमनाथ के मन्दिर पर
आक्रमण करने जाते समय अजमेर से गुजरा था। तत्कालीन राजा बीलमदेव