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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

by नरपति नाल्ह

DevanagariHindipublished315 pages

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Page 281
  • १७८ -
    मील की दूरी पर यू-चेन-ता अथवा "उज्जयन्त" पहाड़ी के नीचे थी। उज्जयन्त
    संस्कृत के "उर्जयन्त" का पाली रूपान्तर है। यह संस्कृत और पाली नाम
    गिरनार पहाड़ियों का है जो जूनागढ़ के पास हैं। "उर्जयन्त" का उल्लेख
    रुद्रदाम और स्कन्दगुप्त के गिरनार शिलालेखों में भी प्राप्त है, यद्यपि शिलालेख
    के कारण सौराष्ट्र की राजधानी जूनागढ़ या यवनगढ़ में, जो वल्लभी से ८७
    मील की दूरी पर है, होना सिद्ध होता है। प्रसिद्ध पर्यटक ह्वेनसांग लिखता
    है कि उसने इस पहाड़ी को घने जंगलों से आच्छादित तथा इसके दोनों किनारों
    को अगणित कमरों और गैलारियों से भरा पाया था। ह्वेनसांग का यह
    वर्णन "पोस्टस्"२ के वर्णन से भी मिलता है, जिसने सन् १८३८ ई० में इस पहाड़ी
    को घने जंगलों और बिना नक़्क़ाशी के चौरस गर्भो पर स्थित छोटे-छोटे कमरों
    से भरा पाया था।
    आज भी "सूरत" नाम इस प्रान्त के हिस्से का है और आज के
    गुजरात कहे जाने वाले नगर में मिला हुआ है। सम्राट् अकबर के समय में
    भी यह प्रायद्वीप दक्षिण दिशा में बहुत बड़ा था। ३जहांगीर के दरबार में टेरी
    ४( Terry ) ने जो सूचना इस प्रायद्वीप के सम्बन्ध में दी थी; उसके अनुसार
    सोरठ का प्रधान शहर "जनागद" अर्थात् "यवन गढ़" अथवा "जूनागढ़"
    कहलाता था। यद्यपि यह प्रान्त छोटा था तथापि उपजाऊ था और इसके
    दक्षिण में समुद्र था। उस समय भी यह नगर गुजरात के साथ नहीं मिलाया
    गया था।
    ह्वेनसांग का कहना है कि सातवीं सदी में "सूरत" या "सुराष्ट्र" का
    क्षेत्रफल ६६७ मील था और पश्चिम में यह माही नदी को छूता था। माही
    नदी मालवा प्रदेश में बहने वाली वह नदी है जो खम्भात की खाड़ी में गिरती
    है। ह्वेनसांग के उपर्युक्त वर्णन को स्वीकार करने पर ऐसा कहा जा सकता
    है कि यह नगर इस प्रायद्वीप के सम्पूर्ण भाग को घेरे हुए था और वल्लभी
    नगर भी इसी के अन्तर्गत था। इसमें सन्देह नहीं कि "वल्लभी" का नाम
    "सूरत" से अधिक प्रख्यात था लेकिन "सूरत" नाम की ख्याति भी पूर्ण
    प्रायद्वीप के लिए सन् ६४० तक थी।
  1. Journal Asiatic Society Bombay Vn P. 119 "The Urjjayat
    hill" P. 123 is urjayat, and P 124 "The jayanta mountain"
    should all be rendered Ujayanta .
  2. Journal Royal Asiatic Society Bengal 1838 P.P. 874,876
    ३. आईने अकबरी, भाग २, पृष्ठ ६६
  3. Voyage to Last India P. 80.