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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

by नरपति नाल्ह

DevanagariHindipublished315 pages

Page 236 of 315

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Page 236
  • १३० -
    जहूँ मूं दो पृछइ धरा नरेस ।
    म्दाहरउ उलगह¹ संभरि देस ॥
    थापउ² गढ़ अजमेर मदि³ ।
    उठे तठ⁴ पया दांषीया⁵ चाषीया⁶ देव⁷ ॥
    माघण दरस बारह हुवा⁸ ।
    गहे⁹ वलगंणि पादरा देव ॥१६०॥
    उलठ¹⁰ वचन कहउ किया¹¹ काज¹² ।
    सत्त जाम हुय मुख¹³ घाव ॥
    वह सुम्द सू भेटा हुई ।
    तठ थे¹⁴ हेतु उठीमा कठ देस ॥
    इस छंद में छंद संख्या ११२, ११३, ११४ की घटना की
    पुनरावृत्ति हुई है -
    यह छंद आ० ६ में १६१ तथा आ० १२ में १७४ है। आ० १२
    पक्ति है - "आनि मिल्या उन बीसल राय ।"
    १. आ० १२ उलगे । २ आ० १२ थापा ।
    ३ आ० १२ मैं । ४ आ० १२ (में नहीं है) ।
    ५ आ० ६ जप्या, आ० १२ चाषीया ६ आ० ६ आषिया ।
    ७ आ० ६ एथ, आ० १२ देव ।
    ८ आ० १२ तजी ।
    ९ आ० १२ (में नहीं है) ।
    यह छंद आ० ६ में १६२ तथा आ० १२ में १७५ है ।
    इस छंद में भी उपर्युक्त छंद संख्या १८८ की तरह, छंद
    संख्या ११२, ११३ और ११४ की घटना की पुनरावृत्ति हुई है ।
    १०. आ० १२ एवला ।
    ११ आ० १२ किण ।
    १२. आ० १२ काजि ।
    १३. आ० १२ मुख हुउ ।
    १४ आ० १२ ये ती ।