बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
by नरपति नाल्ह
DevanagariHindipublished315 pages
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जहूँ मूं दो पृछइ धरा नरेस ।
म्दाहरउ उलगह¹ संभरि देस ॥
थापउ² गढ़ अजमेर मदि³ ।
उठे तठ⁴ पया दांषीया⁵ चाषीया⁶ देव⁷ ॥
माघण दरस बारह हुवा⁸ ।
गहे⁹ वलगंणि पादरा देव ॥१६०॥
उलठ¹⁰ वचन कहउ किया¹¹ काज¹² ।
सत्त जाम हुय मुख¹³ घाव ॥
वह सुम्द सू भेटा हुई ।
तठ थे¹⁴ हेतु उठीमा कठ देस ॥
इस छंद में छंद संख्या ११२, ११३, ११४ की घटना की
पुनरावृत्ति हुई है -
यह छंद आ० ६ में १६१ तथा आ० १२ में १७४ है। आ० १२
पक्ति है - "आनि मिल्या उन बीसल राय ।"
१. आ० १२ उलगे । २ आ० १२ थापा ।
३ आ० १२ मैं । ४ आ० १२ (में नहीं है) ।
५ आ० ६ जप्या, आ० १२ चाषीया ६ आ० ६ आषिया ।
७ आ० ६ एथ, आ० १२ देव ।
८ आ० १२ तजी ।
९ आ० १२ (में नहीं है) ।
यह छंद आ० ६ में १६२ तथा आ० १२ में १७५ है ।
इस छंद में भी उपर्युक्त छंद संख्या १८८ की तरह, छंद
संख्या ११२, ११३ और ११४ की घटना की पुनरावृत्ति हुई है ।
१०. आ० १२ एवला ।
११ आ० १२ किण ।
१२. आ० १२ काजि ।
१३. आ० १२ मुख हुउ ।
१४ आ० १२ ये ती ।