बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
by नरपति नाल्ह
DevanagariHindipublished315 pages
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[ : ६ ] यह प्रति बीकानेर के बड़े उपासरे के
महरचन्द भण्डार में है। इसका अन्तिम पन्ना (सं० १३)
पहले प्राप्त हुआ था लेकिन श्री नाहटा जी के कथनानुसार
इसके अन्य १२ पन्ने कलकत्ते के राय बद्री दास म्यूजियम में
प्राप्त हो गये । इस प्रकार यह प्रति भी पूर्ण हो गई । इसमें
छंदसंख्या ३१० है। प्रत्येक पृष्ठ पर १८ पंक्तियाँ तथा प्रति
पंक्ति में ६० से ६५ तक अक्षर हैं । अन्त में "ग्रन्था ग्रन्थ
१००" लिखा है । इसमें रचना सूचक पद्य 'कोटा' के
भण्डार की प्रति के समान नहीं है ।
[ : ७ ] नाम विसलदे चौहाण को रास । कागज -
देशी ( हाथ का बना हुआ ) दोनों तरफ लिखे हुए । पत्र...
... ११ । आकार १० ई० X ४ ई० पंक्तियों......तेरह,
प्रत्येक पृष्ठ पर । छंद संख्या - २४२; प्रकार - नया ।
पूर्ण साधारणतया ठीक । अक्षर - देवनागरी । सुरक्षित
स्थान - एशियाटिक सोसाइटी ( बंगाल ) कलकत्ता ।
पुष्पिका - इतिश्री विमलदे चौहाण को रास समाप्त
संवत् १७०५ का साल थी मालपुरा मध्ये लिख्यते कृषण पक्ष
असीतवार साध्वी कनकंगी लिखायो । लिखतं जोधपुर मध्ये
साधु पाला रामेण विक्रम संवत् १६०२ फागुन सुदि ६
शनिवासरे । ईस्वी सन् १९१५ के दूसरी तारीख २० जैना-
चार्य श्री धर्म विजय जी की भेजी हुई पुस्तक से लिखी ।
आदि-गउरि का नन्द त्रिभुवन सार । नाइ भेवइ
थारइ उदर भण्डार । एक दंतउ मुषिक छछहछइ । मुसकउ
बाहण तिलक सिन्दूर । कर जोडी नरपति भणइ । आणि करि
रोहिणी जिउं तपइ सूर ।
अन्त-कनक काया जैसी कुंकुं रोल । कठिन
पयोधर हेम क घोल । केसि सरस रूप की पागली । घाइल
ज्युं घण मोडे नाक । कडि मोडे बाली गोरडी । उलिखी
विरह वेदना न सहे कोइ । ज्युं राजा राणी मिल्या । रघु
नान्द कहे मिळियसी सहु कोइ ।