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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

by नरपति नाल्ह

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DevanagariHindipublished315 pages

Page 216 of 315

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Page 216
  • ११० -
    नेजी चढइ राजा नवै छपइ ।
    पंहुश भीड का ए सहिनाण ॥
    पाहुटो गोरदी¹ सु घरे जाइ ।
    जेकरि² आव दे³ भारत दाइ ॥
    सडण⁴ त⁵ धोध्या⁶ माटटो ।
    ब्रात सोपारीप दोन्दी पद छोदि ॥
    बोलउ⁷ सो⁸ निरवाहियो⁹ ।
    गह पडइ¹⁰ घण वे करि जोडि ॥१५४॥
    यह छंद अ० २ खड ३ में ३५ ( अरात ), आ० ६ खड
    ३ में ३२ ( आयत ) है । इन दोनों प्रतियों में संपादित प्रति की
    छंद संख्या १५१ ही है । अर्थात् संपादित प्रति की १५१ और १५३
    मिलाकर एक ही छंद संख्या उपर्युक्त दोनों प्रतियों में है । १५३ की
    १, २, ३, ६ और ७ पंक्तियाँ भी अ० २ और आ० ६ में एक ही
    छंद में हैं । आ० १२ में यह छंद १३८ है । लेकिन आ० १२ में
    २री, ६ठी, ७वीं, तथा ८वीं पंक्तियाँ नहीं हैं । ६वीं पंक्ति के
    बदले है—
    “राजाजी चढीपो इय नवलपै ।
    १. अ० २, आ० ६ गारी, आ० १२ गोरी ।
    २. अ० २, आ० ६, हु लेइ ।
    ३ आ० ६ आविश, आ० १२ आउ ।
    ४ अ० १ सानातो, आ० ६ मुखज्यो, आ० १२ सडण ले ।
    ६. अ० २ बाध्या, आ० ६ बाध्या, आ० १२ बध्यो ।
    ७+८ अ० २ ज्यू बोलइ, आ० ६ जो बोल्यो, आ० १२ बोल्यु सो ।
    ९ अ० २, आ० ६ ने निरवाहि०यो ।
    १० आ० १२, पडै ।
    यह छंद अ० २ खड ३ में ३७, आ० ६ खण्ड ३ में ३५,
    आ० १२ में १३६ है ।
    अ० २ और आ० ६ में इसकी ४थी पंक्ति है—
    “दीधी सोपारी धोयकर प्यार ।”