बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
by नरपति नाल्ह
DevanagariHindipublished315 pages
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नेजी चढइ राजा नवै छपइ ।
पंहुश भीड का ए सहिनाण ॥
पाहुटो गोरदी¹ सु घरे जाइ ।
जेकरि² आव दे³ भारत दाइ ॥
सडण⁴ त⁵ धोध्या⁶ माटटो ।
ब्रात सोपारीप दोन्दी पद छोदि ॥
बोलउ⁷ सो⁸ निरवाहियो⁹ ।
गह पडइ¹⁰ घण वे करि जोडि ॥१५४॥
यह छंद अ० २ खड ३ में ३५ ( अरात ), आ० ६ खड
३ में ३२ ( आयत ) है । इन दोनों प्रतियों में संपादित प्रति की
छंद संख्या १५१ ही है । अर्थात् संपादित प्रति की १५१ और १५३
मिलाकर एक ही छंद संख्या उपर्युक्त दोनों प्रतियों में है । १५३ की
१, २, ३, ६ और ७ पंक्तियाँ भी अ० २ और आ० ६ में एक ही
छंद में हैं । आ० १२ में यह छंद १३८ है । लेकिन आ० १२ में
२री, ६ठी, ७वीं, तथा ८वीं पंक्तियाँ नहीं हैं । ६वीं पंक्ति के
बदले है—
“राजाजी चढीपो इय नवलपै ।
१. अ० २, आ० ६ गारी, आ० १२ गोरी ।
२. अ० २, आ० ६, हु लेइ ।
३ आ० ६ आविश, आ० १२ आउ ।
४ अ० १ सानातो, आ० ६ मुखज्यो, आ० १२ सडण ले ।
६. अ० २ बाध्या, आ० ६ बाध्या, आ० १२ बध्यो ।
७+८ अ० २ ज्यू बोलइ, आ० ६ जो बोल्यो, आ० १२ बोल्यु सो ।
९ अ० २, आ० ६ ने निरवाहि०यो ।
१० आ० १२, पडै ।
यह छंद अ० २ खड ३ में ३७, आ० ६ खण्ड ३ में ३५,
आ० १२ में १३६ है ।
अ० २ और आ० ६ में इसकी ४थी पंक्ति है—
“दीधी सोपारी धोयकर प्यार ।”