Skip to content
SarvaKosh
बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

by नरपति नाल्ह

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished315 pages

Page 194 of 315

Read in context
Page 194
  • ८६ -
    चारगढ१ उजतायउ२ कातिग मास।
    छोड्या३ मंदिर घरि४ क विलास॥
    छोट्या५ चउरा६ पडपडी।
    गढह दंधिरि नयण गमाह्या रोइ७ ॥
    भूख गई८ त्रिप९ उछटी१० ।
    कदि११ सगी१२ नीद किसी परि१३ दीह ॥
    मग सिरोय१४ दिन घंटा रे१५ दोइ।
    सपीय सदेस न पाठवइ१६ कोइ॥
    १. अ० १ चालीयो, आ० १२ चाल्यो।
    २. अ० २, आ० ६आय तो, आ० १२ उलिगाणी।
    ३. अ० २, आ० ६ सूना।
    ४. आ० १२ गिरि।
    ५. अ० २, आ० ६ सूना, आ० ६ नउढ्या।
    ६. आ० ६ चोरा, आ० १२ चौबारा।
    ७. अ० २ बाई, आ० ६ जोय।
    ८. अ० २, आ० ६ नही।
    ६. आ० ६ तइ।
    १०. अ० २ ऊछन्नी, आ० ६ सो छुट्टी, आ० ६ अउचटी।
    ११+१२ अ० २ उणी घडी, आ० ६ तिस घटी।
    १३. अ० २, आ० ६ नीद कहाँ थी।
    यह छंद अ० २ खड ३ में ८, आ० ६ खड ३ में ७, आ० ६ में
    १२२, आ० १२ में ११० है।
    इस छंद की अंतिम दो पंक्तियाँ आ० १२ में नहीं हैं।
    १४. अ० २ आघणकर, आ० ६ आगैं तो, आ० १२ मगसिरिये।
    १५. आ० ६ छोटडी।
    १६. अ० २ मोकलोऊ, आ० ६ मोकल्यो, आ० ६ पाठव्यो, आ० १२
    सदेसा हीन पठायै।