बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
by नरपति नाल्ह
DevanagariHindipublished315 pages
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चारगढ१ उजतायउ२ कातिग मास।
छोड्या३ मंदिर घरि४ क विलास॥
छोट्या५ चउरा६ पडपडी।
गढह दंधिरि नयण गमाह्या रोइ७ ॥
भूख गई८ त्रिप९ उछटी१० ।
कदि११ सगी१२ नीद किसी परि१३ दीह ॥
मग सिरोय१४ दिन घंटा रे१५ दोइ।
सपीय सदेस न पाठवइ१६ कोइ॥
१. अ० १ चालीयो, आ० १२ चाल्यो।
२. अ० २, आ० ६आय तो, आ० १२ उलिगाणी।
३. अ० २, आ० ६ सूना।
४. आ० १२ गिरि।
५. अ० २, आ० ६ सूना, आ० ६ नउढ्या।
६. आ० ६ चोरा, आ० १२ चौबारा।
७. अ० २ बाई, आ० ६ जोय।
८. अ० २, आ० ६ नही।
६. आ० ६ तइ।
१०. अ० २ ऊछन्नी, आ० ६ सो छुट्टी, आ० ६ अउचटी।
११+१२ अ० २ उणी घडी, आ० ६ तिस घटी।
१३. अ० २, आ० ६ नीद कहाँ थी।
यह छंद अ० २ खड ३ में ८, आ० ६ खड ३ में ७, आ० ६ में
१२२, आ० १२ में ११० है।
इस छंद की अंतिम दो पंक्तियाँ आ० १२ में नहीं हैं।
१४. अ० २ आघणकर, आ० ६ आगैं तो, आ० १२ मगसिरिये।
१५. आ० ६ छोटडी।
१६. अ० २ मोकलोऊ, आ० ६ मोकल्यो, आ० ६ पाठव्यो, आ० १२
सदेसा हीन पठायै।