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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

by नरपति नाल्ह

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DevanagariHindipublished315 pages

Page 190 of 315

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Page 190
  • ८४ -
    वर जोड़ी मंत्री कहई$^१$ 'वात ।
    वटीय आलोयणी$^२$ दीधीय मात ॥
    रछा खिंति मानी मुहँ$^३$ परौ ।
    मयलरी सांगरि फउ$^४$ रयवाल ॥
    राय भांईला$^५$ सारियउ$^६$ ।
    द्रिपद् तिलक देई पहिरायउ भूपाल ॥
    तहइ रांणां औ सग यौवणा रिसवाम ।
    तिलक संजोह नहू दीधउ जी आव ॥
    दीनउ सुरत्रा राष्ट्र थी ।
    राणी आई पीछउ राय घऊघ्राण ॥
    १. आ० १२ करै ।
    २. आ० १२ आलोचण ।
    ३. आ० १२ छे ।
    ४. आ० १२ फी ।
    ५. आ० १२ भाएला ।
    ६. आ० १२ सारियौ ।
    यह छंद आ० ६ में नहीं है । आ० १२ में १०८ है । इस छन्द की
    अंतिम पंक्ति आ० १० में है :
    “तिलक देनै पहिरायो भूपाल ।”
    यह छंद आ० ६ में नहीं है ।
    डा० माता प्रसाद जी गुप्त के मतानुसार यह छंद प्रक्षिप्त ज्ञात होता
    है क्योंकि वे कहते हैं कि “इस प्रकार बीसलदेव का सत्कार करने पर
    वह “उलगाना” मात्र न रह जाता और न पीछे ब्राह्मण के कहने पर
    उसकी अपरिचित के रूप में खोज की आवश्यकता पड़ती ।” दे०
    बीसलदेव रास परिशिष्ट पृ० २१६ ।