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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

by नरपति नाल्ह

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DevanagariHindipublished315 pages

Page 178 of 315

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Page 178
  • ७२ -
    रोवती बाउरी पालीयउ¹ नाह ।
    शूमह मन्दिर दीमदीय² षाइ ॥
    गायल कुरडीय³ भौर ज्युं ।
    तबह गाय गयी⁵ मिलि घट्टीयह याइ⁴ ॥
    जाहि⁶ निसन्तान जेटवर⁷ गाय⁸ । ?
    बोलड नाहगेय परिजाह ॥
    सपीय⁹ सदेकीय¹⁰ रही समझाप ।
    निगुणौ दे गुण होइ सठ¹¹ नाह¹² कह¹³ नाह ॥
    १. आ० ६ चालिठ ।
    २. अ० २ मेइदेल्हर, आ० दाये जई, आ० १२ दीघीय ।
    ३. आ० ६ कूरइ, आ० ६ कुरली, आ० १२ कुरले ।
    ४. अ० २ पाँच पडोससा, आ० ६ पाडि पाटोएस, आ० १२ में "तबह"
    नहीं है।
    ५. आ० ६ देखवा आय ।
    ६. अ० २ ओ, आ० १२ जिहि ।
    ७+८. अ० २, आ० ६ करि गयो, आ० १२ क्युँ तण्डइ गयी ।
    यह छंद अ० २ खंड ३ में १, आ० ६ खंड ३ में २, आ० ६ में
    १०२ आ० १२ में ६१ है ।
    लेकिन अ० २ तथा आ० ६ में १ली पंक्ति है—
    "पीय बोलायै धन रोवती आइ ।"
    फिर आ० ६ में ५ वीं और ६ ठी पंक्तियाँ हैं—
    "सोयन छी नै करि गयो ।
    असी रतिनाडै माणस जाय ॥"
    ' एवं अ० २ में ६ठी पंक्ति है—
    "दिवस नइ रात भौ चितांता जाइ ।
    तथा आ० १२ में ६ठी पंक्ति है—भीलो नाह हुइ सुझणि परिज आइ ।
    ६. अ० २, आ० पंच ।
    १०. अ० २, आ० ६ सखीमिलि ।
    ११+१२. अ० २ तउमीय, आ० वोपीउ ।
    १३. आ० ६ किम ।