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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

by नरपति नाल्ह

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DevanagariHindipublished315 pages

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Page 11
  • ३ -
    साधारणतया ठीक; चार खण्डों में विभाजित । अक्षर-
    देवनागरी । सुरक्षित स्थान--विद्याप्रचारिणी जैन सभा,
    जयपुर । श्री अगरचन्दजी नाहटा ने 'राजस्थान भारती', पृ०
    ८३ में लिखा है कि "सं० १६६६ लिखित मल्हारपूर्ण गुटका
    हमारे संग्रह में खरीद करके संग्रह कर लिया गया है।" .
    पुष्पिका-ईति राजा बीसलदे रास राजमती च्यारै-
    खण्ड संपूर्ण भवति । संवत १६६६ वर्षे फागुण वदि १ भौमे
    लिखत दूधापेड़ा मध्ये राज्य श्री धीधी राजचंद्रजी राज्ये ।
    शुभ भवतु ।
    आदि-श्री गुरुभ्योनमः । हंसवाहण मृगलोचनी
    नारि । सीस समारह दिन गिणइ । शिष्य सिरजह उछिगणि
    धरी नारि । जाई दीहाडह झरिती ॥ १ ॥ गौरिका नंदन
    त्रिभुवन सार ॥ नाद देदा थारह उदर भंडार ॥ कर जोड़
    नरपति कहई ॥ मूसा वाहन तिहास्यंदूर ॥ एक दन्तड मुख
    झलमलई । जाचिक रोहणीउ नवर सूर ॥
    अन्त-जूं नारायण मिलियो चंदू । गोवल महि
    मिलइ ज्युं गोव्यन्द । ज्यू उणीगांयहं घरी मील्यो । गदि
    उहिगांण्हं बीधो दो दास । मन का मनोरथ पूरण्या । भणई
    खण्डइँ विणि पूज्यो आस ॥
    रचनातिथि-बारह सै बहोत्तराँ हाँ मंझारि । जेठ
    बदी नवमी बुधवारि ॥ 'नालह" रसायन आरभइ । सारदा"
    तुठि ब्रह्म-कुमारि । कासमीरा कुल-मण्डणी । रास प्रकासी
    बीसल दे राइ ।
    टि०-यही प्रति नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित
    हुई है :-
    [३] नाम-श्री बीसलदे रास । कागज-देशी
    (हाथ का बना हुया) आकार-११ इं० x ५ इं० ।
    पंक्तियाँ-१५ से १६ प्रत्येक पृष्ठ पर । पद्यसंख्या- २७६ ।
    प्रकार-पुराना; पूर्ण; साधारणतया ठीक । अक्षर-देव-