बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
by नरपति नाल्ह
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रूप के अतिरिक्त जो अन्य रूप 'बीसलदेव' रासो में प्राप्त हैं ये नीचे दिये जा
रहे हैं-
एक बचन बहु बचन
अन्य पुरुष-जाणिस्यह, चखवाणगाउठ, मिलैसीय, धाविया, विसामइ,
मिलैसह (स्त्री०)। +
मध्यम पुरुष- + +
प्रथम पुरुष--फरेण, भाणिसिउ (स्त्री०) सेविस्यउ (स्त्री०) मिलठ,
पहुचिस्यौ इत्यादि। |-
पूर्वकालिक क्रिया-
डिंगल में क्रिया के अन्त में 'एवि' 'एविय' 'इ' 'ई', 'अ' 'य' 'नइ'
'करि' आदि प्रत्यय लगा कर पूर्वकालिक क्रिया के रूप बनाये जाते हैं।
रासो में उपर्युक्त प्रत्ययों में से कई एक को लगा कर पूर्वकालिक क्रिया के रूप तो
बनाये गये ही हैं लेकिन इन प्रत्ययों के योग से बने हुए पूर्वकालिक क्रियाओं के
रूपों के अतिरिक्त भी कतिपय अन्य रूप इसमें प्राप्य हैं। नीचे दोनों प्रकार के
रूपों का उदाहरण उपस्थित किया जा रहा है-
( अ ) डिंगल के प्रत्ययों के योग से बनी हुई क्रियाएँ-
सुणइ, कहइ, जाइकरि इत्यादि।
( ब ) डिंगल के प्रत्ययों के अतिरिक्त पूर्वकालिक क्रियाएँ-
सहणजाइ, कहिज्योनाइ, देयणडजाइ, मेलडीजाइ-इत्यादि।
आज्ञा विधि-
रासो में आज्ञा और विधि के रूप निम्न प्रकार के पाये जाते हैं-
एक वचन बहु वचन
अन्य पुरुष-कीजइ, सुखउ, देइ, गमरकरउ, फाड, इत्यादि। +
मध्यम पुरुष-आणिज्यो, देज्यो, जोइज्यो, करिज्यो, वितावावज्यो,
मानिज्यो, सुणिज्यो, निरवाडिज्यो, चालिज्यो, सुण,
सुखउ, कहि, धावउ-इत्यादि। +
प्रथम पुरुष- + +