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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

by नरपति नाल्ह

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DevanagariHindipublished315 pages

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तथा विषय में लोकप्रियता के प्रभाव ही । इसके लिये तो यही कहना पर्याप्त
होगा कि इसकी प्राचीनतम प्रति जो प्राप्त मात्र है वह १६३३ की है। और
और इसका रचनाकाल यदि ११ वीं या १२ वीं शताब्दी का माना जाय जैसा कि
अनेक कारणों से मानना पड़ता है तब तो यह कहना ही पड़ेगा कि भाषा में
अलबेलापन, शब्दों में मनोहरिता और विषय में लोकप्रियता के कारण ही यह
चार सौ वर्षों पश्चात् लेखबद्ध हुआ ।
भाषा
यह ठीक है कि आज की प्राचीनतम हस्तलिखित प्रति हमें यह सोचने के
लिये बाध्य करती है कि यह ग्रन्थ कई शताब्दियों तक मौखिक रहा फिर भी
इसी प्राचीनतम प्रति की भाषा के अन्य रूपक में छिपी हुई प्राचीनता ११ वीं
शताब्दी की भाषा का परिचय देती है। यहाँ वि० सं० १६३३ वाली हस्त-
लिखित प्रति से प्राप्त भाषा का संक्षिप्त व्याकरण इसलिये उपस्थित किया
जा रहा है कि इसके द्वारा ग्रन्थ के रचना-काल की भाषा पर कुछ प्रकाश पड़
सके—
उच्चारण
[१] ग्रन्थ में तालव्य 'श' और मूर्द्धन्य 'ष' का प्रयोग नहीं हुआ है ।
'ष' का प्रयोग 'ख' के रूप में हुआ है—
पाष          खान
पाष          खाज
षेह          खेद
पाषड         खाडड 'खारा'
पडक्षि         पडक्ति ( खौरि )—इत्यादि ।
[२] वर्णमाला के अक्षर 'ऋ' और 'ऌ' का प्रयोग शब्दों के साथ नहीं
है। मूर्द्धन्य 'ण' का प्रयोग शब्दों के अन्त तथा मध्य में दन्त्य 'न' के स्थान पर
बराबर हुआ है। दन्त्य 'न' से प्रारम्भ होने वाले शब्दो में मूर्द्धन्य 'ण' का प्रयोग
नहीं हुआ है—
पाहण          पाहन
भणइँ          भनई
गिणइँ          गिनई