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बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

प्रारंभिक मंगलाचरण, प्राक्कथन एवं दोहा १ से १५० पर्यन्त

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भूमिका.
ब्रजभाषाके साहित्यमें कविवर विहारीलालकी सतसईभी
अपने ढंगका एक अनूठा ग्रंथ है, ऐसा कौन भाषाका रसि-
क है जिसको इस सतसईके दो चार दोहे स्मरण न हों, यह
ग्रन्थ जैसा सरस और मनोरम है वैसाही क्लिष्टभी है इसको
निर्मित हुए अभी पूरे २५० वर्ष भी नहीं हुए हैं, कि, इतनेही
समयमें इसपर बीस पचीस प्रसिद्ध टीके होचुके हैं।
सूरतमिश्र, कृष्णचंद्र, गोपाल, अनवरखां जुल्फिकारखाँ
यूसुफखां, करण, रघुनाथ, लालसरदार, गंगाधर, रामवक्स,
परमानन्द, जोखूरामकी कुण्डली, श्रीसाहित्याचार्यकी
कुण्डली, लल्लू लालादिके बनाये टीकोंसे सतसई अपूर्व
छवि धारण करचुकी है, परन्तु इन टीकोंमें पद्यरचना विशेष
और गद्यरचना न्यून होनेसे कठिनपर कठिनाई पड़नेसे वे
सर्वसाधारणके उपयोगी नहीं हुए हैं, और इसीकारण अति-
रसीली होनेसे भी सतसई घर घर नहीं विराजती है, सर्व-
साधारणकी बुद्धिमें कविवरका आशय प्रगट होजाय इसी
निमित्त सर्वसाधारणके उपयोगी भावार्थप्रकाशिकाटीका
निर्माणकर साथमें कठिन शब्दोंके अर्थ अलंकारादि लक्षण
पर और स्वनिर्मित दोहोंमें लिखकर पुनरुक्तिसे उसका
विस्तार नहीं किया है, और विभाव अनुभावादिका उल्लेख-
मात्र करके उसके समझनेके निमित्त 'साहित्य परिचय'
नामका एक पृथक् प्रबन्ध लिखा है, भावार्थ और अक्षरार्थ
बहुत सरलहो इसपर विशेष दृष्टि रक्खी है और कौनसा
दोहा कहाँ है इसकी खोज करनेमें परिश्रम न पडे इस
कारण सतसईके दोहोंकी अकारादिक्रमसे सूची भी लिखदी

( ४ ) भूमिका ।
है, "साहित्य परिचयसे काव्यलक्षण रसनिरूपण नायिका-
भेद अलंकारादिका ज्ञान पाठकोंको सहजमें होजायगा" और
इससमयकी परिपाटीके अनुसार यथामिलित विहारीदासका
जीवनचरित्र भी लिखदिया है ।
टीका करते समय हमने कई सतसई सन्मुख रक्खीं परन्तु
एकका क्रम एकसे नहीं मिलता, तथा पाठभेदभी बहुत है
इस कठिनाईके दूर करनेके निमित्त आज़मसाही संग्रहके
अनुरूप लल्लूजीलाल संगृहीत दोहोंका अनुसरण करके इस
टीकेको निर्माण किया है ।
विहारीलालकी सतसई क्रमसे निर्मित नहीं हुई, यह एक
भिन्न क्रमका ग्रंथ है। इसीकारण इसमें नायिकाभेदादिका क्रम
अन्यग्रंथोंके अनुसार नहीं है और यही कारण है कि, दो-
होंका एक दूसरेसे अधिक सम्बन्ध नहीं मिलता ।
जितने प्राचीन टीकेहैं उन टीकोंमें साहित्यविषयक कोई त्रुटि
नहीं है बहुत उपयोगी है परन्तु भावार्थ अक्षरार्थ जाननेके लिये
पाठकोंको यह अतिउपयोगी होगा ऐसी मुझे दृढ आशा है ।
इसप्रकार प्रबन्धोंसे इस ग्रंथको अलंकृत कर अपने परम
माननीय जगद्विख्यात वैश्यवंशदिवाकर "वेंकटेश्वर" यन्त्राल-
याध्यक्ष सेठजी श्रीयुत खेमराज श्रीकृष्णदासजी महाशयके
करकमलमें सब प्रकारके स्वत्वसहित समर्पित करदिया है; जि-
न्होंने सबप्रकार कृतकार्य कर हमको सदैव उत्साहित कियाहै।
यथासाध्य दोहोंको शुद्ध कर सन्निवेशित कियाहै इसपरभी
यदि कहीं अशुद्धि रहगईहो तो पाठकगण क्षमाकरेंगे कारणकि,

श्रीः ।
कविवर विहारीलालजीका-
जीवनचरित्र ।
भारतवर्षमें यद्यपि भाषाके अनेक कवि हुए हैं परन्तु
विहारीलालकी सतसईभी कविताका एक अनुपम भंडार है
कौन ऐसा रसिक है कि, जिसका चित्त इनके दोहोंको श्रवण
कर एक बारही रसमयपूर्ण न होजाय स्वयं कविने कहा है ।
दोहा-सतसैयाके दोहरे, ज्यों नावकके तीर ॥
देखतके छोटे लगें, घाव करें गम्भीर ॥ १ ॥
ब्रजभाषा बरणी कविन, बहुविधिबुद्धिविलास।
सबकी भूषण सतसई, करी विहारीदास॥ २ ॥
और इसमें कुछभी सन्देह नहीं कि, सतसईमें यही गुण
है इस समयकी पृथाके अनुसार विहारीलाल कवीश्वरका
समय जाति कुल गोत्रका परिचय पाये बिना पाठक सन्तुष्ट
नहीं होंगे इस कारण इसमेंभी कुछ परिश्रम कर यथाशक्ति
पाठकोंके सन्मुख इनका परिचय उपस्थित करते हैं इनके
समयका निर्णय करनेमें तो कुछ आपत्ति नहीं पडती कारण
कि, स्वयंही कविवरने कहा है ।

( ४ ) भूमिका ।
है, "साहित्य परिचयसे काव्यलक्षण रसनिरूपण नायिका-
भेद अलंकारादिका ज्ञान पाठकोंको सहजमें होजायगा"और
इससमयकी परिपाटीके अनुसार यथामिलित विहारीदासका
जीवनचरित्र भी लिखदिया है ।
टीका करते समय हमने कई सतसई सन्मुख रक्खीं परन्तु
एकका क्रम एकसे नहीं मिलता, तथा पाठभेदभी बहुत है
इस कठिनाईके दूर करनेके निमित्त आज़मसाही संग्रहके
अनुरूपलल्लूजीलाल संगृहीत दोहोंका अनुसरण करके इस
टीकेको निर्माण किया है ।
विहारीलालकी सतसई क्रमसे निर्मित नहीं हुई, यह एक
भिन्न क्रमका ग्रंथ है। इसीकारण इसमें नायिकाभेदादिका क्रम
अन्यग्रंथोंके अनुसार नहीं है और यही कारण है कि, दो-
होंका एक दूसरेसे अधिक सम्बन्ध नहीं मिलता ।
जितने प्राचीन टीकेहैं उन टीकोंमें साहित्यविषयक कोई त्रुटि
नहीं है बहुत उपयोगी है परन्तु भावार्थ अक्षरार्थ जाननेके लिये
पाठकोंको यह अतिउपयोगी होगा ऐसी मुझे दृढ आशा है ।
इसप्रकार प्रबन्धोंसे इस ग्रंथको अलंकृत कर अपने परम
माननीय जगद्विख्यात वैश्यवंशादिवाकर "वेंकटेश्वर" यन्त्राल-
याध्यक्ष सेठजी श्रीयुत्क्षेमराज श्रीकृष्णदासजी महाशयके
करकमलमें सब प्रकारके स्वत्वसहित समर्पित करदिया है; जि-
न्होंने सबप्रकार कृतकार्य कर हमको सदैव उत्साहित कियाहै।
यथासाध्य दोहोंको शुद्ध कर सन्निवेशित कियाहै इसपरभी
यदि कहींअशुद्धि रहगईहो तो पाठकगण क्षमाकरेंगे कारणकि,

श्रीः ।
कविवर बिहारीलालजीका-
जीवनचरित्र ।
भारतवर्षमें यद्यपि भाषाके अनेक कवि हुए हैं परन्तु
बिहारीलालकी सतसईभी कविताका एक अनुपम भंडार है
कौन ऐसा रसिक है कि, जिसका चित्त इनके दोहोंको श्रवण
कर एक बारही रसमयपूर्ण न होजाय स्वयं कविने कहा है ।
दोहा-सतसैयाके दोहरे, ज्यों नावकके तीर ॥
देखतके छोटे लगैं, घाव करैं गम्भीर ॥ १ ॥
ब्रजभाषा बरणी कविन, बहुविधि बुद्धिविलास।
सबकी भूषण सतसई, करी बिहारीदास॥ २ ॥
और इसमें कुछभी सन्देह नहीं कि, सतसईमें यही गुण
है इस समयकी प्रथाके अनुसार बिहारीलाल कवीश्वरका
समय जाति कुल गोत्रका परिचय पाये बिना पाठक सन्तुष्ट
नहीं होंगे इस कारण इसमेंभी कुछ परिश्रम कर यथाशक्ति
पाठकोंके सन्मुख इनका परिचय उपस्थित करते हैं इनके
समयका निर्णय करनेमें तो कुछ आपत्ति नहीं पडती कारण
कि, स्वयंही कविवरने कहा है ।

( ६ ) बिहारीलालजीका-
संवत ग्रहशशिजलधिक्षिति, छठतिथि वासर चंद
चैतमास पखकृष्णमें, पूरण आनंदकंद ॥ ३ ॥
संवत् १७१९ चैत्रकृष्ण छठ चन्द्रवारके दिन सतस-
ईको पूर्ण किया, इस वचनसे तो इनका समय जाननेमें अब
किसी प्रकार सन्देह नहीं रहा, परंतु इस बातमें विवाद
पड़ता है कि, उक्त कविका कुल गोत्र क्या था नीचे लिखे दोहेके
आश्रित हो कोई उनको राय कोई सनाढ्यमिश्र कोई रामचं-
द्रिकाप्रणेता केशवदासका पुत्र कोई कान्यकुब्ज, कोई मा-
थुर ब्राह्मण कहकर उनके परिचय देते हैं वह दोहा यह है ।
जन्म लियो द्विजराजकुल, प्रगट बसे ब्रज आय।
मेरे हरो कलेश सब, केशव केशवराय ॥ ४ ॥
ब्राह्मण श्रेष्ठ कुलमें जन्म लिया ब्रजमें आकर प्रगट बसे के-
शव ( कृष्ण ) केशवराय पिता ( पिता ) मेरे सम्पूर्ण क्लेश
हरो ॥ ४ ॥
इस दोहेमें केशवराय पर अवलम्बन करके जो कविव-
रको राय कथन करते हैं, यह युक्ति संगत नहीं, क्योंकि
इसके साथही वह द्विजराज कुलका जन्म कहते हैं कि, केश-
वरायने ब्राह्मणकुलके उच्चवंशमें जन्म लिया, और ब्रजमें
आकर बसे केशवराय नाम था कुछ उसके अन्तमें कुलोपा-
धिका कथन नहीं है, इसकारण यह सिद्ध होता है कि, के-

जीवनचरित्र । (७)

शवरायजी अन्य स्थानसे ब्रजसेवनके लिये आवसे थे और
ब्रजमेंही कविवर विहारीलालका जन्म हुआ जिसकारण उ-
नके सब आचार विचार ब्रजभाषा सब ब्रजवासियोंकी ही स-
मान थी. अब इस बातका विचार करना है कि, कविप्रिया
रसिकप्रिया रामचन्द्रिकादि प्रसिद्ध ग्रन्थोंके निर्माता कविवर
केशवदासजीही इनके पिता थे और इसीकारण उनको सनाढ्य
ब्राह्मणमिश्र कहाजाय तो यह भी युक्तिसंगत बोध नहीं
होता, कारण कि, टिहरीनिवासी कविवर केशवदासजीका
शरीर लगभग १६७० संवत्में पात होगया था गोस्वामी
तुलसीदासजीसे पहिलेही यह मृतक होगये, अर्थात् ओडछा-
धीश राजा इन्द्रजित्के अभिचारसे समाजसहित प्रेतयोनिको
प्राप्त होगये ।
इनके निर्मित ग्रन्थोंकी अधिकाईसे विदित होता है कि,
इनकी अवस्था साठ सत्तर वर्षकी होगी यदि कविवर विहा-
रीलाल तीस वर्षकी अवस्थामें उत्पन्न हुए हों तो भी सतसई
निर्माणसमय उनकी अवस्था सत्तर वर्षके लगभग होनी चा-
हिये परंतु सतसई देखनेसे साफ विदित होता है कि, सतसई
का निर्माण पूर्ण युवावस्थामें हुआ है, सतसईके रसलि भाव
देखनेसे उस समयतक सतसईकारकी अवस्था तीसवर्षकी
कदाचित् न हुई हो, और केशवदासजीकाभी ब्रजवास
प्रसिद्ध नहीं है इस कारण इन केशवदासजीके पुत्र कविवर

( ८ ) बिहारीलालजीका-
बिहारीलालजी नहीं हैं, और सनाढ्यब्राह्मणभी नहीं हैं.
क्योंकि इनके और केशदासजीके समयमें बड़ा अन्तर है।
अब दूसरा विचार है कि, कितनेही विचारशीलोंके मतसे
बिहारीलालको माथुरवंशदिवाकर एवं भाषाकाव्यसंग्रहमें
इनको कान्यकुब्जवंशोत्पन्न वर्णन किया है।
यदि इनको कान्यकुब्ज मानें तो सतसईमें केवल इतनी
उपपत्ति प्राप्त होती है कि, “प्रगट भये द्विजराजकुल” अर्थात्
श्रेष्ठ ब्राह्मणकुलमें जन्म लिया और ब्रजमें आकर बसे इसमें
यह विदित होता है कि, कविवरके पिता अन्यस्थानसे यहां
आकर बसे थे, और कुछ सन्देह नहीं कि, वे केशवरायजी
कान्यकुब्ज हों अबभी देखाजाता है कि, कान्यकुब्जोंको कुला-
भिमान अत्यन्त होता है और कविवरने भी अपने निमित्त द्वि-
जराजकुल कहा है इससे अधिक कान्यकुब्जोंमें धीरता वीर-
ता भी होती है और बिहारीलाल जयसाहके साथ संग्रामोंमें
भी रहे हैं यथा।
यौं दल काढ़े बलखतें, तैं जयसिंह भुआल ।
वदन अघासुरके परे, ज्यों हरि गाय गुवाल ॥१॥
बस इससे अधिक और प्रमाण हमारें दृष्टिगोचर नहीं
हुआ दूसरा पक्ष बिहारीलालके माथुर एवं एक और ग्वॉलि-
यरके निकट बसुआ गोविन्दपुर गाँव इनकी जन्मभूमि गाई.

जीवनचरित्र । ( ९ )
जाती है, और मथुरामें ससुराल कही जाती है परन्तु माथुर-
वंशसे इस पक्षमें विरोध नहीं है, लोकमें कृष्णकविको वि-
हारीलालका पुत्र और शिष्यभी कहते हैं यदि सत्यही यह वि-
हारीलालके पुत्र हैं तो नीचे लिखे दोहेके अनुसार वह माथुर-
ब्राह्मण हैं ।
माथुर विप्र ककोरकुल, बसत मधुपरी गाँव ॥
जो हो उनके आचार व्यवहारसे तथा गोविन्दपुरमें केश-
वरायका वर्णन मिलनेसे अधिकतर यही विदित होता है कि,
कदाचित् विहारीलालजी माथुरवंशावतंसही हों कारण कि,
और स्थानोंकी अपेक्षा माथुरवंशमें इनकी चरचा अधिक है,
जो कुछभीहो कविवर विहारीलालके उच्चकुल ब्राह्मण होनेमें
तथा अनेकभाषाके ज्ञाता और संस्कृतके पंडित होनेमें तो
किसीको किसीप्रकारका सन्देह नहीं है ।
अभी यह बातभी जाननेयोग्य है कि, सतसई किसप्रकार
निर्मित हुई स्वयं यदा तदा विहारीलालजी लिखतेरहे वा
इसमें किसीकी प्रेरणाथी इसके लिये इतनाही बहुत होगा कि-
हुकुम पाय जयसाहको, हरिराधिका प्रसाद ।
करी विहारी सतसई, भरी अनेक सवाद ॥
इस वचनसे जयशाहकी आज्ञासे सतसईका निर्माण होना
जानाजाता है और राजाज्ञाकेही कारण बहुत समझ सोचकर

( १० ) बिहारीलालजीका-
शनैः २ यह ग्रन्थ निर्मित हुआ है, और जयसाहके परलोक
पहुँचनेपरभी पीछे कुछ दोहे लिखेगये हैं, जिनमें कुछ नीति
वैराग्य आदिकीभी छटा लक्षितहोती है ।
जयसिंह कौन थे इनके यहाँ बिहारीलाल कैसे पहुँचे इस
बातकाभी प्रगटहोना अवश्य है यद्यपि इसमेंभी कुछमतभेद
पडता है क्योंकि कई जयसिंह हुए हैं परन्तु इतिहाससे जैसा
कुछ मिलता है सो वर्णन करते हैं ।
सम्वत् १६७२ में राजा मानसिंहका देवलोक हुआ
तदुपगन्त महाराज कुँवर भाऊसिंह गद्दीपर बैठे यह कुछ प्र-
तापशाली न हुए, इसकारण इनके कुछही दिन उपरान्त
महासिंह राजा हुए सम्वत् १६७५ में महासिंहने गद्दी पाई
यहभी पूर्वजके समान अत्यन्त पानासक्त होकर अकालमें
कालकवलित हुए, राजा मानसिंहके इन दो उत्तराधिकारि-
योंकी अयोग्यतासे अम्बरका गौरव मलीन होगया था, इसी
अवसरमें जोधपुरके राजा सम्राट् सभामें प्रधानताके पदको
पागयेथे, जहांगीरने अपनी बेगम महारानी जोधबाईकी स-
म्मतिसे जगतसिंहके पुत्र ( मानसिंहके भतीजे ) को अम्ब-
रका सिंहासन देदिया, इसकारण सम्राट्‌की प्यारी बीवी नूर-
जहांको अत्यन्त डाह हुआ भट्टग्रन्थमें लिखाहै कि, रनवा-
सके एक बगमदेमें बैठकर बादशाहने अपनी स्त्री जोधबाईसे
जयसिंहको राज देनेके लिये सम्मति की थी, जयसिंहभी एक

" have a nuqta?
Look at "काग़ज": under ग there is a small dot (nuqta) or dirt? "काग़जका" or "कागजका". Let's write "काग़जका" or "कागजका".
Wait, look at "काग़जका": there's a dot below 'ग': "काग़ज़का" or "काग़जका".

Line 21:
"राजाकी सेजपर बिछादिया जब संवेरेको फूल कुंभलाये और काग़ज देखकर"
Wait, let's check every word:
"राजाकी" -> र ा ज ा क ी
"सेजपर" -> स े ज प र
"बिछादिया" -> ब ि छ ा द ि य ा
"जब" -> ज ब
"संवेरेको" -> स ं व े र े क ो (or सबेरेको? There is an anusvara over स, and it's व: "संवेरेको" or "सवेरेको"? There is a dot over स: "संवेरेको")
"फूल" -> फ ू ल
"कुंभलाये" -> क ु ं भ ल ा य े (or कुम्हलाये? It has 'भ': क ु ं भ ल ा य े = कुंभलाये!)
"और" -> औ र
"काग़ज" -> क ा ग़ ज
"देखकर"

( १२ ) बिहारीलालजीका-
इसको सुनकर महाराज बहुत प्रसन्न हुए और दरबार
किया तथा विहारीलालको बहुत कुछ भेंट देकर अपने स्था-
नपर रखलिया। इसही दोहेपर १०० अशरफी उक्त कविको
मिलीं परन्तु महाराजने कहा कि, इसप्रकारके दोहेपर एक
एक गाँवभी थोड़ा है, आगे औरभी दोहे बनानेकी आज्ञादी
कविवर-जयपुर अम्बरमें रहने लगे इनके काव्यमें जयपुरके
दृश्यके अनेक दोहे पायेजाते हैं ॥
यथा-(फीको परै न वर फटै रँगो लोहरँग चीर, मनहुताफता
कीन) इत्यादि अनेक वर्त्ता मूलग्रन्थमें देखनेसे मिलेंगी।
गजपूतानेमें जयसिंह मिरजानामसे प्रसिद्ध हैं, यह मान-
सिंहके योग्य वंशधर हुए औरंगजेबके राजत्वकालमें इन्हों
ने मुगलोंके बहुत उपकार किये थे इसीकारण औरंगजेबने
इनका ६००० सेनाका सेनापति बनाया, इसी कुशवह
वीरके कौशल जालसे महाराज कुलतिलक शिवाजी वन्दी
होगये थे उससमय विहारीलालने पढ़ा था ।
सामा सैन मयान सुख, सबै शाहके साथ।
बाहुबली जयशाहज्, फते तिहारे हाथ ॥
महाराज जयसिंहने शिवाजीको निरापद् रखनेकी प्रति-
ज्ञाकी थी परन्तु जब औरंगजेबके कपटसे वह टूटनेपर हुई
तब महाराज जयसिंहने शिवाजीके भगानेमें सहायता की यह

जीवनचरित्र। ( १२ )
महानुभावता साधारण बात नहीं है परन्तु इनके उज्ज्वल
माहात्म्यके गौरवमें विश्वासघातका कुछ कुछ कलंक झिल-
मिलाने लगा था, महाराज जयसिंहकेही यत्नसे कपटखान
औरंगजेबके समस्त कूटचक्र विफल हुए थे महाराज जयसिं-
हके यहां बाईस सहस्र राजपूत घुड़सवार और २२ ही प्रधा-
न सेनापति थे अन्य ग्रन्थोंमे लिखाहै कि, महाराज अपने
कई सरदारोंको साथ लेकर दरबारमें बैठा करते थे,दरबारमें
बैठनेके समय हाथमें दो दर्पण लेलेते थे एक दर्पणको दिल्ली
और दूसरेको सितारा बताकर भूमिमें डालदेते, दिल्लीवाले द-
र्पणको हाथमें रखकर कहाकरते थे कि,सितारा तो पातालको
चला और दिल्लीके भाग्यका डोराभी मेरे बायें हाथमें है।
मैं इच्छा करूं तो इसकोभी इसी प्रकार स्वच्छन्दतासे वशी
भूत करसकता हूं, धीरे धीरे यह बात औरंगजेबके कानतक
पहुँचगई, सम्राट् इनके प्राणोंका ग्राहक हुआ, परन्तु जय-
सिंह कोई साधारण राजा नहीं थे, जो औरंगजेब इनको
इच्छाकरतेही मारडालता औरंगजेबने एक घृणित उपायको
अवलम्बन किया, महाराज जयसिंहके कीरतसिंह नामक
एक छोटा पुत्र था, इसको राज्यका लोभ दिलाकर महारा-
जके विरुद्ध उकसाया, जब देखा कि, यह सबप्रकारसे मेरी
सहायता करनेको तैयार है, तब कीरतसिंहसे कहा तुम
जयसिंहको मारडालो में तुमको अम्बरकी गद्दी देदूंगा, कैसी
भयानक बात है कि, राजकुलमें जन्म लेकर राज्यके लिये

( ५४ ) बिहारीलालजीका-
ऐसे गुणवान् पिताको मारडालनेका विचार ! दुःखकी बात है
कि, पाखण्डी कीरतसिंहने इस भयानक दुष्कर्मको करना
स्वीकार किया और अफीमके साथ विष मिलाकर महाराजको
भक्षण कराया, परन्तु इस पितुघाती पाखण्डीको वादशाहने
भी धोखादिया, केवल एक कामता नामक जनपद इस
कुलांगारके हाथ आया ।
जिस दिन राक्षसपुत्रकी विश्वासघातकता और नृशंसतासे
राजपूतगौरव महाराज जयसिंह इस लोकको छोड़गये,
उसही दिन अम्बग्के भाग्याकाशमें एक गंभीर काला मेघ
छागया, उसके साथही कुशावहकुलकी गौरवगरिमा प्रभा-
हीन होगई फिर वह गंभीर मेघ लोप नहीं हुआ जिन कुशावह
राजाओंके प्रचण्डप्रतापसे एक समय दिल्लीका सिंहासन
कम्पायमान होगया था उनके वंशधरोंने फिर उस प्रदीप्त गौ-
रवको प्राप्त नहीं किया मानों आजतक उस वधका प्रायश्चित्त
पूर्ण नहीं हुआ है ।
सम्वत १७२४में जब इस प्रकार जयशाहका शरीर पात
हुआ और उनके दायाद ※ रामसिंह और कृष्णसिंहने राज्य

जीवनचरित्र । ( १५ )
के निमित्त झगड़ा किया, इससमय प्रजाको बड़ी कठिनाई
पड़ी थी कदाचित् इसीसमय कविवरने यह दोहा कहाहै ।
दोहा-दुसह दुराज प्रजानको, क्योंनबाढ़ै दुखद्वंद ।
अधिक अँधेरोजगकरै,मिलिमावसरविचंद॥
फिर राज्यकी पलटसे गुणगाहक न रहनेके कारण कवि-
वरने वहां रहना उचित न जाना कदाचित् ऐसेही प्रसंगपर
नीचे लिखा काव्य कियाहो ।
दोहा-चलेजाहु ह्यां को करत,हाथिनकोव्यवहार।
नहिं जानत ह्यां वसत हैं,धोबी और कुम्हार
जिन दिन देखे वे कुसुम, गई सुबीत बहार ।
अब अलि रहीगुलाबकी,निपटकटीलीडार
कहते हैं कि, यही विचार कविवर वहांसे कृष्णकविको
साथले मारवाड़की ओर चलेगये, उससमय दरबारमें इनके
दोहोंका अर्थ होता था,विद्वानोंने कई२ प्रकारसे अर्थ किये थे
विहारीलालने देखा कि,अपना परिचय अब देना ठीक नहीं
कारण कि, इससे अधिक और अर्थ अब हम क्या करेंगे,
मारवाड़के विषयमें उन्होंने कहा है ।
दोहा-विषमवृपादिकीकृपा,जियैमतारनिशोधि
अमितअपारअगाधजल, मागोमूँढ़ पयोधि

( १६ ) बिहारीलालजीका-
प्यासे दुपहरजेठके, थके सबै जल शोधि ।
मरु घर पाय मतीरही, मारू कहतिपयोधि ॥
बिहारीलाल तत्कालभी प्रसंगानुसार दोहा निर्माण कर-
ते थे कोई चित्रकार एक वृक्षके नीचे अहि मयूर मृग बाघ
बनाकर लाया महाराज जयसिंहने बिहारीलालसे यह प्रसंग
पूँछा तब कविवरने कहा ।
दोहा-कहलाने एकतवसत, अहि मयूर मृगबाघ।
जगत तपोवनसोकियो, दीरघदाघनिदाघ॥
जब जयसाह इस संसारको त्यागगये तब इन कविवरका
चित्त शृंगाररसकी ओरसे खिंचगया और नीति उपदेश
आदिके दोहे निर्माणकर संवत् १७१९ में उन्होंने सतसई
पूर्ण करदी ।
अन्य कवीश्वरोंकी भांति बिहारीलालने अपने महाराजकी
लम्बी चौड़ी प्रशंसा न करके राधाकृष्णके गुणानुवादमें विशेष
कविता निर्माण की है, इसमें कुछभी सन्देह नहीं कि, अन्तके
जीवनके दिन उन्होंने भगवद्भजनमेंही व्यतीत किये इसके
प्रमाणके निम्नलिखित दोहे हैं ॥
दोहा-अपने २ मत लगे, वादि मचावत शोर ।
ज्यों त्यों सबको सेइबो, एकै नंदकिशोर॥

जीवनचरित्र । ( १७ )
मोहिं तुम्हें बाढी बहस, को जीते यदुराज।
अपने २ विरदकी, दुहूँ निबाहन लाज ॥
आगे कितने समयतक कविवर इस संसारमें रहे सो
विदित नहीं होता सतसई क्रमानुसार नहीं लिखीगई यह
फुटकर दोहे भिन्न समयमें भिन्न २ विषयक कथन हुए हैं
पीछे जब ग्रन्थ दुर्लभसा होने लगा तब रसिकजनोंने अपनी
इच्छानुसार इसको शृंखलाबद्ध किया और किसी किसीने
टीकेभी निर्माण किये यद्यपि इसपर बीस पच्चीस टीका हुई हैं
परन्तु प्राचीन टीकाओंमें सूरतमिश्रकी टीका सराही-
जाती है ।
यद्यपि कविवरका पूर्ण वृत्तान्त अलभ्य हे परन्तु इसके
न मिलनेसे कोई विशेष क्षति नहीं है उनका एक दोहाभी
जबतक भूमण्डलमें रहेगा तबतक उनका गौरव और
कीर्त्ति संसारमें विद्यमान रहेगी इसकारण अधिक विस्तार न
करके इतनेहीमें कविकी जीवनी पूर्ण करते हैं ।
पण्डित-ज्वालाप्रसादमिश्र.

साहित्यपरिचय ।
सतसईमें साहित्यविषयक जो वर्णन आयाहै उसको
संक्षेपसे वर्णन करतेहैं साहित्यदर्पणमें ' वाक्यरसात्मकंका-
व्यम्' और काव्यप्रकाशमें'तददोषौ शब्दार्थौ सगुणवनलंकृ-
तिः पुनः क्वापीति' और रसरहस्यके कवि कहतेहैं ।
जगते अद्भुत सुखसदन, शब्दरु अर्थ कवित्त ।
यह लक्षण मैंने कियो, समुझि ग्रन्थ बहु चित्त ॥
इसमें जगतसे अद्भुत सुख लोकोत्तर चमत्कारकाही
नाम काव्य कथन हुआहै, इससेभी यह विदित होताहै कि,
इसके बिना सुखकी प्राप्ति नहीं इसकारण जिस कवितामें
रस सुख लोकोत्तर चमत्कारहै वही काव्य कहाताहै, का-
व्यके अनेक भेदहैं तथा उसकी शक्ति अभिधालक्षणा व्यं-
जनादिका विस्तार साहित्यग्रन्थोंमें विस्तारके साथ लिखा-
है, यहां केवल प्रयोजनीय विषयको वर्णन करतेहैं, जिसके
होनेसे काव्य कहलाताहै वह रस क्या है ? ।
मिलि विभाव अनुभाव अरु, संचारी सुअनृप ।
व्यंग्य कियो थिरभाव जो, मोई रस सुख भूप ॥
अपना सामर्थ्यवान मनोविकार उसके कारण उसके
कार्य और सहकारी मनोविकार यह क्रमसे स्थायीभाव

साहित्यपरिचय। ( १९ )
विभाव अनुभाव संचारीभाव कहाते हैं इनके योगसे पुष्टहुए
स्थायीभावको रस कहते हैं।
नाटक देखने काव्य पढ़नेसे जो एक विलक्षण सुख आ-
नंद प्राप्त होताहै उसीका नाम रसहै, चमत्कार कहनेका आ-
शय यह कि, वारंवार अनुभव करनेसे सुखहीकी प्राप्तिहो इस
प्रकारका विलक्षण आनंद कविकी रचनाचातुरीसे प्रगट
होताहै सहृदय पुरुषही इसके अनुभव करनेमें समर्थ हैं
अन्य नहीं ऊपर कही सब सामग्री जिस श्लोकमें व जिस
कवित्तमें होती है वही सरस कहाताहै।
कविजनोंके हृदयमें जो मनोविकार उठतेहैं तथा जो
प्रकृतिका अनुभव उनको यथार्थरूपसे होगयाहै उसका
यथायोग्य वर्णन करके दूसरोंके हृदयमें उसकी पूर्णता
दिखासकतेहैं।
इसीप्रकार हर्ष शोक भय त्रास आदि मनोविकारभी
कारण कार्य और सहकारी प्रसंगके अनुसार जानने योग्य
हैं अर्थात् कविजन अपने काव्यमें जिन २ मनके विकारोंका
वर्णन करतेहैं, उन सबके कारण कार्य और उनके सहकारी
अपर मनोविकार इन सबका काव्यमें यदि सविस्तर
और यथायोग्य उद्भावन करें तो ऐसे काव्यके पढ़ने वा ना-
टकके देखनेसे दूसरोंकेभी अन्तःकरणमें वही मनोविकार
जागृत होतेहैं और यह स्पष्ट जानपडताहै कि, हम उनका