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भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary

by भावमिश्र

Source: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (origin)

DevanagariSanskritpublished143 pages

Page 84 of 143

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Page 84

१५० भावप्रकाशनिघण्टुः
अन्य प्रकार की अप्रिय संवेदनाओं का ज्ञान कम होता है। मन शान्त होकर निद्रा आती है।
अधिक मात्रा में अवसाद होकर स्पर्शज्ञान तथा सुख एवं दुःख के समझने की शक्ति कम होती
है तथा कुछ बेहोशी सी मालूम होकर नींद आती है। नींद के बाद सर में दर्द तथा हृल्लास
मालूम होता है। वातनाडियों पर इसका विशेष प्रभाव नहीं पड़ता।
हृदय के ऊपर इसका कोई विशेष परिणाम नहीं होता केवल प्राणदा (Vagus) नाडी
केन्द्र की उत्तेजना से इसकी गति कम होकर उसे बल प्राप्त होता है। अधिक मात्रा में श्वसनकेन्द्र
के अवसाद के कारण अन्य दुष्परिणाम दिखलाई देते हैं।
इसकी अल्प मात्रा से श्वसन क्रिया मंद लेकिन गम्भीर होती है। अधिक मात्रा में लेने से
श्वसनकेन्द्र का अवसाद होकर श्वसन बहुत कम होते हुवे बाद में अनियमित हो जाता है। श्वसनकेन्द्र
के घात एवं श्वासावरोध से मृत्यु होती है। कासकेन्द्र बहुत ही अल्प मात्रा से अवसादित होता है।
औषधीय मात्रा से श्वसनियों का अल्प विस्फार होता है लेकिन अधिक मात्रा में संकोच हो जाता है।
इससे सभी प्रकार के स्राव कम होते हैं किन्तु पसीना एवं दुग्ध कम नहीं होता है। पाचक
स्राव कम होता है जिससे भूख कम हो जाती है। अफीम में अन्य क्षाराम होने के कारण आन्त्र
की पुरस्सरण क्रिया अधिक कम होती है। इससे विबन्ध होता है तथा वेदनाहर होने के कारण
शूल दूर होता है। स्राव कम होने से मुख, जीभ तथा गला सूखने लगता है।
चर्मगत रक्तवाहिनियों के विस्फार एवं स्वेद पिण्डों की उत्तेजना से पसीना अधिक होता है
जिससे शरीर का ताप कम होता है। गला एवं चेहरे की रक्तवाहिनियों के विस्फार से कान गरम
हो जाते हैं।
इससे मूत्र की मात्रा पर कोई परिणाम नहीं होता, लेकिन कभी कभी बस्तिद्वार के संकोच से
कुछ रुकावट हो जाती है। कुछ विद्वानों के मत से मधुमेहियों के मूत्र में शर्करा की मात्रा तथा
यूरिया (Urea) की मात्रा कम हो जाती है। वृक्क की विकृति में इसका उत्सर्ग शीघ्र न होने के
कारण सावधानी के साथ इसका प्रयोग करना चाहिये। केन्द्रीय प्रभाव से, प्रारम्भ में वमन केन्द्र
की उत्तेजना से वमन होता है, लेकिन अधिक मात्रा सेवन करने पर केन्द्रावसाद होजाने के कारण
वामक द्रव्यों के प्रयोग से भी वमन नहीं होता ।
केन्द्रीय प्रभाव से आंखों की पुतलियों का संकोच होता है। इसमें स्थानिक वेदनाहरण का
गुण नहीं है। इसका प्रधूषण श्लैष्मिक कला तथा छिले हुये चर्म से होता है। वेदनाहर
प्रभाव केन्द्रीय प्रभाव के कारण होता है।
बच्चों एवं स्तनपान कराने वाली स्त्रियों में सावधानी के साथ इसका प्रयोग करना चाहिये।
यदि रोगी को यह न बताया जाय की उसे अफीम दी जा रही है तो लगातार कई दिन तक देते
रहने पर भी अफीम की आदत नहीं पड़ती।
अफीम के अन्य क्षाराम - अफीम का मादक प्रभाव मुख्यतया मॉर्फीन के कारण है
तथा अन्य परिणाम इतर क्षारामों के कारण होते हैं। मॉर्फीन, पँपेहेराइन, कोडीन, नार्कोटीन
तथा थीबेन में मादक प्रभाव क्रमशः कम कम होता जाता है। प्रधूषण देर में होने के
कारण मॉर्फीन की अपेक्षा अफीम का परिणाम देर में होता है लेकिन वह अधिक समय
तक स्थायी रहता है। नार्कोटीन तथा पँपेहराइन आन्त्रिक मांसपेशियों को शिथिल करते
हैं जब कि मॉर्फीन एवं कोडीन उनके तनाव को बढ़ाते हैं जिससे अफीम अधिक विबन्ध
करने वाली होती है। नार्कोटीन एवं पँपेहेराइन श्वसन केन्द्र को उत्तेजित करते हैं। मॉर्फीन
एवं कोडीन की विषाक्तता नार्कोटीन बढ़ाता है। इसी प्रकार नार्कोटीन एवं पँपेहेराइन,


हरीतक्यादिवर्गः १५१
मॉर्फीन के कार्य को बढ़ाते हैं। कोडीन एवं नार्कोटीन का सम्मिलित प्रभाव मॉर्फीन की तरह
होता है जब कि दोनों अलग अलग बहुत ही अल्प प्रभावशाली हैं। ३ मि. ग्रा. नार्कोटीन तथा
३ मि. ग्रा. मॉर्फीन का सम्मिलित प्रभाव ६० मि. ग्रा. मॉर्फीन के बराबर होता है। कोडीन
कास के केन्द्र को बहुत अल्प मात्रा में अवसादित करता है तथा मधुमेही में शर्करा की मात्रा कम
करता है। थीबेन नामक क्षाराम कुपीलुसत्व के सदृश सुषुम्ना को उत्तेजित करता है।
अफीम तथा मॉर्फीन के प्रयोग
(१) अल्प मात्रा में अफीम का उपयोग उत्तेजक औषध के रूप में बहुत अच्छा होता है। डर
लगना, उदासीनता, चिन्तायुक्त वृत्ति, खेदवृत्ति, थोड़े से क्रोध से हाथ पैर कांपने लगना,
थकावट एवं वृद्धावस्था में जीवन से निराश होना ऐसी परिस्थितियों में इससे बहुत लाभ होता है।
निरोगी अवस्था में प्रयोग से कामवासना बढ़ती है।
(२) बहुत विचार करना, बहुत अभ्यास करना, चिन्ता तथा जिन जिन व्याधियों में पीडा
की वजह से नींद न आती हो उनमें इसको निद्रा के ३ घण्टे पूर्व उपयोग किया जाता है।
(३) शूल, पीड़ा एवं प्रक्षोभ आदि के लिये यह बहुत ही उपयोगी है। इसका उपयोग
गृध्रसी, वातनाडी शोथ, कटिशूल, सन्त्रिशूल, पार्श्वशूल, कष्ठातंव, चोट, शरीर का जलना, अस्थिभग्न,
सन्धिभंग शल्यक्रिया के पूर्व एवं पश्चात, आन्त्रिकशूल, पैत्तिकशूल, वृक्कशूल, अश्मरी, आमाशयिक
शूल, आमाशय प्रक्षोभ, आमाशयिक व्रण, आन्त्रिक व्रण एवं कर्कटार्बुद आदि में किया जाता है।
वृक्कजन्य आक्षेप में मूत्रल औषधों के साथ इसे देते हैं।
(४) अतिसार एवं संग्रहणी आदि में जब मल पक हो जाता है लेकिन ग्रहणी दौर्बल्य से
दस्त बन्द नहीं होते तब अन्य ग्राही औषधियों के साथ इसकी गोली का प्रयोग किया जाता है।
ऐसी अवस्थाओं में जातीफलादि रस (भै० २०) या दुग्धवटी (भै० २०) का अच्छा उपयोग होता
है। विसूचिका की प्रारंभिक अवस्था में अहिफेनासव के रूप में इसका उपयोग किया जा सकता है
लेकिन शीताङ्ग अवस्था में इसका प्रयोग न करें। टायफॉइड (आन्त्रिक ज्वर) में अतिसार हो तो
इससे दस्त कम होने के साथ साथ वातिक लक्षणों में भी लाभ होता है। डर, घबड़ाहट तथा अन्य
मानसिक कमजोरी के कारण होने वाले अतिसार में भी इससे लाभ होता है।
(५) प्रतिश्याय के प्रारम्भ में स्वेदल औषध के रूप में इसको देते हैं।
(६) रक्तष्ठीवन में इसका उपयोग किया जाता है। इससे रक्त का दबाव कम होता है, हृदयं
की गति मन्द होती है, खांसी कम होती है, मानसिक चिन्ता दूर होती है एवं नींद आती है।
रक्तातिसार तथा आमाशयव्रण में आंत्रिक गति कम होकर लाभ होता है।
(७) शुष्क कास, दमा, कुकास, फुफ्फुसावरण शोथ एवं क्षयज ग्रन्थियों की वृद्धि से प्रक्षोभ
होकर सूखी खांसी आती हो तो इसको मधु के साथ चटाने से लाभ होता है। जिसमें कफ बहुत
जमा हो और जिसमें खांसी कफ निकल जाने के लिये आरही हो उसमें अफीम का प्रयोग नहीं
करना चाहिये। श्वासकृच्छ्र, नीलीमा एवं श्वसनमार्ग में अवरोध हो तो इसका प्रयोग न करें।
दमें में इसके प्रयोग से आदत पड़ने की सम्भावना रहती है इसलिये जहां तक हो प्रयोग न करें।
(८) हृदय एवं रक्तवाहिनियों के कारण यदि श्वासकृच्छ्र हो तो इससे बहुत लाभ होता है
लेकिन यदि जलोदर आदि के दबाव से हृदय का कार्य ठीक न होता हो तो इसका प्रयोग न करें।
(९) प्रचुर लालास्राव, श्वेतप्रदर एवं मधुमेह में इससे लाभ होता है। मधुमेह में अफीम
का प्रयोग बहुत किया जाता है लेकिन कर्नल चोपरा के मत से इसमें बिलकुल लाभ नहीं होता।