Skip to content
SarvaKosh
भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary

by भावमिश्र

Source: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (origin)

DevanagariSanskritpublished143 pages

Page 4 of 143

Read in context
Page 4

सङ्केत

अं०अंग्रेजीपहा०पहाड़ी
अ०अरबीपाठा०पाठान्तर
अफ०अफगानीफा०फारसी
आसा०आसामीबं०बंगाली
इरा०ईरानीबंब०बंबई
उ(डि)०उड़ियाभोटि०भोटिया
उ० प्र०उत्तर प्रदेशम०मराठी
क०कर्नाटकमल०मलयालम
क० अ०कल्पस्थान अध्यायमा०मारवाड़ी
काश्मी०काश्मीरमि० ग्रा०मिलीग्राम
काठी०काठियावाडमि० मि०मिलीमीटर
कुमा०कुमाऊँमुंगे०मुंगेर
को०कोंकणीयू०यूनानी
खासि०खासियार०रत्ती
गढ०गढवालरा० नि०राजनिघण्टु
गु०गुजरातीरा० पु०राजपुताना
गो०गोवालि०लिपचा
ग्रा०ग्रामले०लेटिन
च०चरकसं०संस्कृत
चि०चिकित्सास्थानसन्ता०सन्ताल
तां०तामिलसिं०सिन्धी
तुलुतुलुसिलो०सिलोनी
ते०तेलगुसु०सुश्रुत
द०दक्षिणसू०सूत्रस्थान
ध० नि०धन्वन्तरीय निघण्टुहि०हिन्दी
ने०नेपालीFam.Family
पं०पंजाबीSyn.Synonym (पर्याय)

सम्पादकीय

सृष्टि के प्रारम्भ काल से व्याधियों के निराकरण के लिये वानस्पतिक द्रव्यों का
प्रयोग होता चला आया है । प्रारम्भ में वनस्पतियों का चिकित्सा में प्राकृतिक
स्वरूप में ही उपयोग होता रहा। धीरे-धीरे रासायनिक तत्वों या कार्यकारी घटक
द्रव्यों के अनुसंधान एवं जीव रासायनिक रचना शृङ्खलाओं के विज्ञान के
अनुसंधान के कारण आज तक विकसित हुये नवीनतम वानस्पतिक औषध द्रव्यों
का प्रयोग हो रहा है। प्रारम्भ में मानव जीवन अधिक स्वाभाविक रूप में रहने
तथा छोटे-छोटे जनपदों में निवास करने और चिकित्सोपयोगी वानस्पतिक
समुदाय के निकट रहने के नाते उनसे भली प्रकार परिचित रहता था। बाद के
दिनों में बड़े जन समुदायों में निवास करने एवं वनस्पति सम्पदा के सान्निध्य से
दूर रहने की परिस्थिति में चिकित्सा विषय के अध्येताओं एवं अध्यापकों को इस
बात की आवश्यकता का अनुभव हुआ कि भैषज्य संहिताओं—निघण्टु ग्रन्थों का
सर्वाङ्गीण परिचयात्मक साहित्य संग्रहीत किया जाय और उन वनस्पतियों का
प्रत्यक्ष स्वरूप जानने के लिये जंगलों में निवास एवं विहार करने वाले आभीर,
कोल, किरात, शिकारी एवं तपस्वी वर्ग से परिचय प्राप्त किया जाय ।

गोपालास्तापसा व्याधा ये चान्ये वनचारिणः ।
मूलजातिश्च ये तेभ्यो भेषजव्यक्तिरिष्यते ॥
प्रायो जनाः सन्ति वनेचरास्ते गोपादद्यः प्राकृतनामसंज्ञाः ।
प्रयोजनार्था वचनप्रवृत्तिर्यस्मात्ततः प्राकृतमित्यदोषः ॥

धीरे-धीरे चिकित्सकों का वानस्पतिक जगत् से प्रत्यक्ष सम्बन्ध टूटने लगा
और चिकित्सा साहित्य में निर्दिष्ट वनस्पतियों का परिचय ही उनके परिज्ञान के
लिये अपर्याप्त होते हुए भी पर्याप्त स्वीकार किया जाने लगा। इस परिस्थिति में
वनस्पतियों के क्षेत्र में अनेक भ्रान्तियों का समावेश होना स्वाभाविक था। इतने
विशाल देश में असंख्य भाषाओं, लिपियों, मान्यताओं, रूढ़ियों आदि के कारण
तथा विभिन्न क्षेत्रों की वानस्पतिक सम्पदा के विचित्र स्वरूप होने के कारण और
एक ही नाम से अनेक वनस्पतियों के अभिधान के कारण तथा रचनाकारों के
पर्याय प्रेम के कारण उत्तर कालीन वनस्पतिवेत्ताओं के सामने वनस्पतियों के
असन्दिग्ध निर्णय की समस्या जटिलतम होती गई । इस कठिनाई के निराकरण