भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)
Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary
by भावमिश्र
Source: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (origin)
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Read in contextअथ हरीतक्यादिवर्गः
रसगुणवीर्यविपाकप्रभावाणां स्वरूपमभिधाय कुत्र द्रव्ये के रसगुणवीर्यविपाकप्रभावाः सन्तीति
बोधयितुं द्रव्यगतान् रसगुणवीर्यविपाकप्रभावानाह ।
तत्र प्रथमं हरीतक्या उत्पत्तिनामलक्षणगुणानाह
दक्षं प्रजापतिं स्वस्थमश्विनौ वाक्यमूचतुः । कुतो हरीतकी जाता तस्यास्तु कति जातयः ।
रसाः कति समाख्याताः कति चोपरसाः स्मृताः ।
नामानि कति चोक्तानि किं वा तासां च लक्षणम् ॥ २॥
के च वर्णा गुणाः के च का च कुत्र प्रयुज्यते । केन द्रव्येण संयुक्ता कांश्च रोगान्व्यपोहति ॥
प्रश्नमेतद्यथा पृष्टं भगवन्वक्तुमर्हसि । अश्विनोर्वचनं श्रुत्वा दक्षो वचनमब्रवीत् ॥ ४॥
पपात बिन्दुर्मेदिन्यां शक्रस्य पिबतोऽमृतम् । ततो दिव्यात्समुत्पन्ना सप्तजातिहरीतकी ॥५॥
रस, गुण, वीर्य, विपाक तथा प्रभाव के स्वरूपों को कहकर किस द्रव्य में कौन रस, कौन गुण,
तथा कैसा वीर्य, विपाक एवं प्रभाव रहता है, इन सब को बताने के लिये प्रत्येक द्रव्यगत रस,
गुण, वीर्य, विपाक तथा प्रभाव का वर्णन करते हैं। उसमें प्रथम हरीतकी (हरड़) की उत्पत्ति,
नाम, लक्षण तथा गुणों को कहते हैं—
एक समय स्थिर चित्त से बैठे हुए भगवान् दक्ष प्रजापति से दोनों अश्विनीकुमारों ने यह बात
कही कि—हे भगवान् ! हरीतकी (हरड़) कहां से उत्पन्न हुई ? और उसकी कितनी जातियां हैं ?
तथा उसमें प्रधान रूप से कौन-कौन रस और कौन-कौन उपरस कहे हुये हैं ? एवं उसके कितने नाम
कहे गये हैं ? और उन सबों के क्या-क्या लक्षण हैं ? और उनका वर्ण कैसा है ? उनमें गुण कौन-कौन हैं ?
और किस जाति के हरड़ का किस कार्य में प्रयोग किया जाता है ? तथा किन द्रव्यों के साथ संयोग
होने पर किन रोगों को दूर करती हैं ? इन उपर्युक्त प्रश्नों का जैसा मैंने पूछा है वैसा ही आपको
उत्तर देना उचित है । इस प्रकार से दोनों अश्विनीकुमारों के वचनों को सुन कर दक्षप्रजापति ने यह
कहा कि—एक समय अमृत पान करते हुए भगवान् इन्द्र के मुख से दैवात् एक बूँद अमृत पृथ्वी पर
गिर पड़ा तब उसी दिव्य अमृत बिन्दु से सात जाति वाली हरीतकी उत्पन्न हुई ॥ १-५ ॥
अथ हरीतकीनामान्याह
हरीतक्यभया पथ्या कायस्था पूतनाऽमृता । हैमवत्यव्यथा चापि चेतकी श्रेयसी शिवा ॥६॥
वयस्था विजया चापि जीवन्ती रोहिणीति च ॥ ७ ॥
हरीतकी के नाम—हरीतकी, अभया, पथ्या, कायस्था, पूतना, अमृता, हैमवती, अव्यथा, चेतकी,
श्रेयसी, शिवा, वयस्था, विजया, जीवन्ती तथा रोहिणी ये सब 'हरीतकी' के नाम हैं ॥ ६-७ ॥
अथ हरीतक्याः सप्तभेदानाह
विजया रोहिणी चैव पूतना चामृताऽभया । जीवन्ती चेतकी चेति पथ्यायाः१ सप्तजातयः ॥
१. 'विज्ञेया' इति पा० ।