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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 999 of 1416

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Page 999

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ९६७

श्वेत पुनर्नवा, लाल पुनर्नवा, खिरेंटी, कंघी, पाठ, अडूसा, गिलोय, चीतेकी जड और कटेरी ये प्रत्येक औषधि बारह बारह तोले लेकर एक द्रोण जलमें पकावे । जब चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर उस काथमें २०० पल पुराना गुड और एक प्रस्थ शहद डालकर मृत्तिकाके घृतसे चिकने बासनमें भरदेवे और उस बर्त्तनके मुखको अच्छेप्रकार बाँधकर जौकी राशिमें गाडदेवे । फिर एक महीनेके बाद उसको निकाले और उसमें नागकेशर, दारचीनी, इलायची, कालीमिरच, सुगन्धवाला, पत्रज इन औषधियोंके दो दो तोले चूर्णको बारीक पीसकर मिलावे एवं घृत और शहद एक एक प्रस्थ मिलादेवे । इस अरिष्टको भोजनके पचजानेपर रोगका बलाबल विचारकर उपयुक्त मात्रासे सेवन करे तो हृदयरोग, पाण्डुरोग, अत्यन्त बढीहुई सूजन, तिल्ली, ज्वर, अरुचि, प्रमेह, गुल्म, भगन्दर, छः प्रकारके उदररोग, खाँसी, श्वास, संग्रहणी, कोठ, खुजली, शाखाश्रित वायु, मलबद्धता, हिचकी, किलासरोग, हलामक और अनेकों रोग शीघ्र नष्ट होते हैं तथा बल, रूप, आयु और ओजकी वृद्धि होती है एवं निर्मल कान्ति उत्पन्न होती है । इसपर मांसरसके साथ अन्न भोजन करना पथ्य है ॥ ४४-४८ ॥

शोथमें पथ्य ।

संशोधनं लङ्घनमस्रमोक्षः स्वेदः प्रलेपः परिषेचनं च ।
पुरातनाः शालयवाः कुलत्थाः मुद्गाश्च गोधाऽपि च
शल्कोऽपि ॥ ४९ ॥ भुजङ्गभुक् तित्तिरि ताम्रचूड-
लावादयो जाङ्गलमिष्टिकराश्च । कूर्मोऽपिशृङ्गी प्रपुराण-
सर्पिस्तक्रं सुरा माक्षिकमासवश्च ॥ ५० ॥ निष्पाव-
कार्वेल्लक रक्तशिग्रुरसाल कर्कोटकमाणमूलम् । सुवर्चला
गृञ्जनकं पटोलं वेत्राग्रवार्त्ताङ्गनमूलकानि ॥ ५१ ॥ पुन-
र्नवाचित्रकपारिभद्रश्रीपर्णनिम्बक्षुरपल्लवानि । एरण्ड-
तैलं कटुका हरिद्रा हरीतकी क्षारनिषेवणं च ॥ ५२ ॥
भल्लातकं गुग्गुलु वायसं च कटूनि तिक्तानि च दीप-
नानि । मूत्राणि गोऽजामहिषीभवानि कस्तूरिका चापि
शिलाजतूनि ॥ ५३॥ यत्पाण्डुरोगिष्वपि वह्निकर्म पुरा