भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in contextचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ९५९
पुनर्नवादि गुग्गुलु ।
पुनर्नवां दार्व्वभयां गुडूचीं पिबेत्समूत्रां महिषाक्षयुक्ताम् ।
त्वग्दोषशोथोदरपाण्डुरोगस्थौल्यप्रसेकोर्द्ध्वकफामयेषु ॥ ९७ ॥
पुनर्नवा, देवदारु, हरड और गिलोय ये प्रत्येक समान भाग और इन सबोंके बराबर भाग गूगल लेकर एकत्र सूक्ष्म चूर्ण करलेवे । फिर इस चूर्णको अण्डीके तेलमें खरल करके गोमूत्रके साथ पान करे । यह गूगल त्वचासम्बन्धी रोग, सूजन, उदररोग, पाण्डुता, स्थूलता, प्रसेक और कफजनित समस्त विकारोंमें अधिकतर उपयोगी है ॥ ९७ ॥
दशमूलहरीतकी ।
दशमूलकषायस्य कंसे पथ्याशतं पचेत् ।
तुलां गुडाद् घने दद्यात् व्योषक्षारं चतुष्पलम् ॥
त्रिसुगन्धं सुवर्णांशं प्रस्थार्द्धं मधुनो हिमे ॥ ९८ ॥
दशमूलके एक आढक परिमाण काथमें १०० हरडोंको पोटलीमें बांधकर पकावे । पकते पकते जब चौथाई भाग शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे और पोटलीमेंसे खोलकर हरडोंकी गुठली निकालडाले । फिर इस काथमें १०० पल पुराना गुड एवं पूर्वोक्त हरडें डालकर पकावे । पकनेपर जब पाक गाढा पडजाय तब उसमें सोंठ, मिरच, पीपल, जवाखार ये प्रत्येक आठ आठ तोले तथा दारचीनी, इलायची और तेजपात ये प्रत्येक औषधि दो दो तोले परिमाण लेवे और सबको एकत्र कूट पीसकर डालदेवे और जब पाक शीतल हो जाय तब ३२ तोले शहद डालकर अच्छे प्रकार मिलादेवे ॥ ९८ ॥
दशमूलहरीतक्यः शोथान्हन्युः सुदारुणान् ।
ज्वरारोचकगुल्मार्शोमेहपाण्डूदरामयान् ॥ ९९ ॥
प्रत्येकमेव कर्षांशं त्रिसुगन्धे मितो भवेत् ॥ १०० ॥
कंसहरीतकी चैषा चरके पठ्यतेऽन्यथा ।
एतन्मानेन तुल्यत्वं तेन तत्रापि वर्ण्यते ॥ १ ॥
यह दशमूलहरीतकी कठिनतम शोथ, ज्वर, अरुचि, गुल्म, अर्श, प्रमेह, पाण्डु और उदरके सब विकारोंको नाश करनेवाली है । चरकमें इसका ‘कंसहरीतकी’ ऐसा पाठ है । वहाँभी इसी मानके समान औषधियाँ लेनी चाहिये ॥ ९९-१०१ ॥