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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 982 of 1416

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Page 982
९६०भैषज्यरत्नावली ।[ शोथ-

चीतेकी जड, इन्द्रजौ, गजपीपल, सेंधानमक, पीपल, लौंग जायफल, सुहागा, लोहा, अभ्रक, शुद्ध गन्धक और शुद्ध पारा इनको अलग अलग दो दो तोले लेवे। फिर सबको एक जगह कूटपीसकर जलके योगसे उत्तम प्रकार खरल करके एक एक रत्तीकी सुन्दर गोलियाँ बनालेवे। इनमेंसे प्रतिदिन प्रातःसमय एक एक गोलीं तालमखानेके रसके साथ खावे ॥ ३६ ॥ ३७ ॥

ज्वरमष्टविधं हन्ति साध्यासाध्यमथापि वा ।
कासं श्वासं तथा शोथं प्लीहानं हन्ति दुस्तरम् ॥ ३८ ॥
मेहं मन्दानलं शूलं संग्रहग्रहणीं तथा ।
अवश्यं नाशयेच्छोथं कर्दमं भास्करो यथा ॥ ३९ ॥
शोथकालानलो नाम रोगानीकविनाशनः ॥ ४० ॥

इससे आठों प्रकार साध्य व असाध्य ज्वर, खाँसी, सूजन, तिल्ली दुस्तर प्रमेह, मन्दाग्नि, शूलरोग, संग्रहणी, विशेषकर सूजन एवं अन्यान्य सम्पूर्ण रोगोंके समूह निश्चय नाश होते हैं। जिस प्रकार सूर्य्य अपनी तीक्ष्णतर किरणोंके अग्रभागसें कीचको एकदम सुखादेता है। इसका नाम शोथकालानल रस है ॥ ३८-४० ॥

क्षेत्रपालरस ।

हिङ्गुलं च विषं ताम्रं लौहं तालकटङ्कणम् ।
जीरकं चाहिफेनं च समभागं विमर्दयेत् ॥ ४१ ॥
यवार्द्धा वटिका कार्या पथ्यं दुग्धौदनं हितम् ।
वारिहीनं ह्यलवणं दातव्यं भिषजां वरैः ॥ ४२ ॥
गुरुशोथमग्निमान्द्यं ग्रहणीमतिदुस्तराम् ।
ज्वरं च विषमं जीर्णं नाशयेन्नात्र संशयः ॥ ४३ ॥

सिंगरफका पारा, शुद्ध मीठा तेलिया, ताम्रभस्म, लोहभस्म, हरताल, सुहागा, जीरा और अफीम इन सबको समान भाग लेकर एकत्र जलसे खरल करलेवे। फिर आधे जौकी बराबर गोलियाँ बनालेवे। तदुपरान्त नित्यप्रति प्रातःकाल एक एक गोली दूधके साथ सेवन करे। इसके सेवन करनेपर रोगी जबतक आरोग्य न हो तबतक वैद्योंको नमक और जलका त्याग करके प्यास लगनेपर दूध और क्षुधा लगनेपर दूध भातका पथ्य देना चाहिये। यह रस भारी सूजन, मन्दाग्नि, दुस्तर संग्रहणी, पुराने और विषम ज्वरको बहुत शीघ्र नष्ट करता है। इसमें कुछ सन्देह नहीं है ॥ ४१-४३ ॥