भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in context६६ भैषज्यरत्नावली । [ चिकित्सा-
करनेसे तथा अनेक प्रकारके भयंकर उत्पात ग्रहबाधासे उत्पन्न हुए ज्वर दान, शान्ति-पाठ, स्वस्तिवाचन और अतिथिपूजन आदि सत्कर्मोंके द्वारा दूर होते हैं ॥ ४९ ॥
ओषधीगन्धविषजौ विषपित्तप्रबाधनैः ।
जयेत्कषायैर्मतिमान् सर्वगन्धकृतैर्भिषक् ॥ ५० ॥
वैद्य ओषधिकी गन्धसे और विषसे आगन्तुक उत्पन्नहुए ज्वरोंको विष और पित्तको शमन करनेवाली ओषधियोंके क्वाथ एवं सर्वगन्ध ओषधियोंके क्वाथके द्वारा शमन करे ॥ ५० ॥
सर्वगन्ध ।
चातुर्जातककर्पूरं कंक्कोलागुरुकुंकुमम् ।
लवंगसहितं चैव सर्वगन्धं विनिर्दिशेत् ॥ ५१ ॥
चातुर्जात ( दारचीनी, इलायची, तेजपात, नागकेशर ), कपूर, कंकोल, अगर, केशर और लौंग इन सबको सर्वगन्ध कहते हैं ॥ ५१ ॥
क्रोधजे पित्तजित् काम्या अर्थाः सद्वाक्यमेव च ।
आश्वासनेष्टलाभेन वायोः प्रशमनेन च ॥ ५२ ॥
हर्षणैश्च शमं यान्ति कामशोकभयज्वराः ।
कामात्क्रोधज्वरो नाशं क्रोधात्कामसमुद्भवः ॥ ५३ ॥
याति ताभ्यामुभाभ्यां च भयशोकसमुद्भवः ॥ ५४ ॥
क्रोधजनित ज्वरमें पित्तनाशक क्रिया करनी चाहिये। तथा काम्य( इच्छित पदार्थ ) और अर्थ प्रदान एवं सद्बचनोंके द्वारा चिकित्सा करनी चाहिये । काम, शोक और भयजनित ज्वर आश्वासन देने, इष्ट वस्तुके प्राप्त होने, वातनाशक उपचारोंके करने और हर्षजनक क्रियाओंके करनेसे शमन होते हैं। कामसे क्रोधज्वर, क्रोधसे कामज्वर और काम तथा क्रोध इन दोनोंके द्वारा भय व शोकजनितज्वर दूर होते हैं ॥५२-५४॥
भूतविद्यासमुद्दिष्टैर्बन्धावेशनताडनैः ।
जयेद्भूताभिषङ्गोत्थं मनःशान्तेश्च मानसम् ॥५५ ॥
भूताभिषंग अर्थात् भूत, प्रेत, यक्ष आदिकी बाधासे उत्पन्नहुए ज्वरको भूतविद्यामें कहीहुई बन्धन, आबेशन, ताडन आदि क्रियाओंके द्वारा दूर करे और मानसिक मनसे उत्पन्नहुए ) ज्वरको मनको शान्त करनेवाले उपायोंके द्वारा शमन करे ॥५५॥