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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 956 of 1416

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Page 956
९२४भैषज्यरत्नावली ।[ प्लीहा-यकृत्-

नागवल्लीरसेनैव मर्दयेद्यत्नतो भिषक् ।
पुटेद्गजपुटे विद्वान् स्वाङ्गशीतं समुद्धरेत् ॥ ५८ ॥
मधुना पिप्पलीचूर्णं सगुडां वा हरीतकीम् ।
अजाजीं वा गुडेनैव भक्षयेदनुपानतः ॥ ५९ ॥
यकृद्गुल्मोदरहरः प्लीहश्वयथुनाशनः ।
जीर्णज्वरं तथा पाण्डु कामलां च विनाशयेत् ॥
अग्निमान्द्यं च शमयेल्लोकनाथो रसोत्तमः ॥ ६० ॥

१-शुद्ध पारा, गन्धक और ताँबेकी भस्म ये सब समान भाग लेकर खरल कर लेवे। फिर इसमें पारेसे तिगुनी लोहेकी भस्म, ताम्रभस्म और कौडीकी भस्म एकत्र मिलाकर पानके रसमें खरल करके गजपुटमें रखकर फूँकदेवे । जब स्वाङ्गशीतल होजाय तब निकालकर पीसलेवे । इसको प्रतिदिन दो रत्ती प्रमाण खाय और ऊपरसे पीपलका चूर्ण, मधुके साथ या पुराना गुड और हरडका चूर्ण अथवा काले जीरेका चूर्ण गुडके साथ मिलाकर सेवन करे । यह रस यकृत्, गुल्म, उदर, प्लीहा, सूजन, पुराना बुखार, पाण्डु, कामला, मन्दाग्नि आदि विकारोंको नष्ट करता है। यह लोकनाथनामवाला रस सर्वोत्तम है ॥ ५६-६० ॥

रसगन्धौ समौ कृत्वा मर्दयेदर्द्धयामकम् ।
रसतुल्यं मृतं चाभ्रं द्विगुणं लौहताम्रकम् ॥ ६१ ॥
ताम्रस्य द्विगुणं भस्म कपर्दकसमुद्भवम् ।
नागवल्लीरसैर्घर्मे मर्दयेदतिनिर्जने ॥ ६२ ॥
ततो लघुपुटं दत्त्वा सुशीतं ग्राहयेत्तथा ।
द्विगुञ्जमार्द्रकद्रावैः खदिरत्वग्रसं पिबेत् ॥ ६३ ॥
यकृत्प्लीहोदरं शोथमग्निमान्द्यादिकं जयेत् ।
लोकनाथो रसो नाम सर्वज्वरविनाशनः ॥ ६४ ॥

२-शुद्ध पारा और शुद्ध गन्धक दोनोंको समान भाग लेकर अर्द्ध प्रहरतक खरल करे । फिर इसमें पारेकी बराबर अभ्रकभस्म एवं लोहे और ताँबेकी भस्म पारेसे दुगुनी और ताँबेकी भस्मसे दुगुनी कौडीकी भस्म मिलाकर पानाके रसमें एक प्रहरतक खरल करके लघुपुटमें पकावे । जब स्वयं शीतल हो जाय तब निकालकर चूर्ण करलेवे । इस चूर्णको दो रत्ती भर लेकर अदरखके रसमें मिलाकर खावे और पीछेसे खैरके रसको पीवे तो यकृत् विकार,