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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 946 of 1416

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Page 946

९१४ भैषज्यरत्नावली । [ प्लीहा-यकृत्-


अग्निद्वारा सेंकना और विषप्रयोग इत्यादि क्रिया, आहार तथा औषधियाँ उदररोगमें दोषानुसार व्यवहार करनेसे विशेष उपकार होय ॥

उदररोगमें अपथ्य ।

संस्नेहनं धूमपानं जलपानं शिराव्यधः ।
छर्द्दिर्यानं दिवानिद्रां व्यायामं पिष्टवैकृतम् ॥ ७९ ॥
उदकानूपमांसानि पत्रशाकांस्तिलानपि ।
उष्णानि च विदाहीनि लवणान्यशनानि च ॥ ८० ॥
शिम्बीधान्यं विरुद्धान्नं दुष्टनीरं गुरूणि च ।
महेन्द्रगिरिजातानां सरितां सलिलानि च ॥ ८१ ॥
विष्टम्भिनि विशेषात्तु स्वेदं छिद्रसमुद्भवे ।
वर्जयेदुदरव्याधौ वैद्यो रक्षन् निजं यशः ॥ ८२ ॥

स्नेहद्रव्योंका पान, धूमपान, अधिक जलपान, शिरावेध (फस्तखुलवाना) वमन करना, हाथी, घोडे आदिपर चढना, दिनमें शयन, कसरत करना, पिठ्ठीके बने द्रव्य, जलमें रहनेवाले और अनूपदेशके जीवोंका मांस, पत्रवाले शाक, तिल, गरम, दाहकारक द्रव्य, नमक, शिम्बीधान्य (अडहर, मोठ आदि), प्रकृतिविरुद्ध और पचनेमें भारी पदार्थोंका भोजन, दूषित जल, हिमालयसे निकली हुई नदियोंका जल, अजीर्णकारक द्रव्य, (और विशेषकर छिद्र होजानेवाले उदररोगमें स्वेदक्रिया करना) इत्यादि सम्पूर्ण कृत्य, आहारादिकोंको त्याग देवे ॥ ७९–८२ ॥

इति भैषज्यरत्नावल्यामुदररोगचिकित्सा ।


प्लीहा और यकृतकी चिकित्सा ।

प्लीहोद्दिष्टां क्रियां सर्वां यकृन्नाशाय योजयेत् ।
यकृत (जिगर) रोगमें प्लीहारोगोक्त विधिके अनुसार चिकित्सा करे ।

तालपुष्पोद्भवः क्षारः सुगुडः प्लीहनाशनः ॥ १ ॥
ताडके फूलोंके खारको पुराने गुडमें मिलाकर भक्षण करनेसे प्लीहा (तिल्ली) रोग नष्ट होता है ॥ १ ॥