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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 939 of 1416

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Page 939

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ९०७

त्रिकुटा, दन्ती, और जीरा ये प्रत्येक सात सात भाग लेकर एकत्र चूर्ण करलेवे। फिर इस चूर्णको जयन्तीके पत्तोंके रस, थूहरक दूध, भाङ्गरेके रस, चीतेकी जडके रस और अण्डीके तेलमें अलग अलग क्रमानुसार सातबार सात सात भावना देवे । तदनन्तर इसको चार माशे प्रमाण गरम जलके साथ सेवन करे ॥

विरेचनं भवेत्तेन तक्रयुक्तं ससैन्धवम् ॥ ३३ ॥
दिनान्ते दापयेत्पथ्यं वर्जयेच्छीतलं जलम् ।
सर्वोदरहरः प्रोक्तः श्लेष्मवातहरः परः ॥ ३४ ॥

इसके सेवनसे जब अच्छे प्रकार दस्त होजायँ तब शामके वक्त सैंधेनमकसे युक्त मट्ठे और भातका पथ्य देवे । इसपर शीतल जल पान न करे । यह रस सर्वप्रकारके उदररोग और कफ-वातजन्य रोगोंको दूर करता है ॥ ३३ ॥ ३४ ॥

चुलिकावटी ।

रसो गन्धो विषं तालं त्रिकटु त्रिफला तथा ।
टङ्कणं समभागं च जयपालं चतुर्गुणम् ॥ ३५ ॥
भृङ्गराजरसेनाथ केशराजरसेन वा ।
मधुना वटिका कार्या पञ्चगुञ्जामिता शुभा ॥ ३६ ॥

शुद्ध पारा, गन्धक, शुद्ध मीठातेलिया, हरिताल, त्रिकुटा, त्रिफला और सुहागा ये प्रत्येक समभाग और शुद्ध जमालगोटा सब द्रव्योंसे चौगुना लेवे । सबको एकत्रितकर भाङ्गरेके रस और शहदके साथ अथवा केशराज ( काले भाँगरे ) के रस और शहदके साथ उत्तम रीतिसे खरल करके पाँच पाँच रत्तीकी गोलियाँ तैयार करलेवे ॥ ३५ ॥ ३६ ॥

चुलिकाख्या वटी ख्याता शोथोदरविनाशिनी ।
कामलां पाण्डुरोगं च आमवातं हलीमकम् ।
हन्त्याद्भगन्दरं कुष्ठं प्लीहानं गुल्ममेव च ॥ ३७ ॥

इसका चुलिकावटी नाम है । यह सूजन, उदररोग, कामला, पाण्डु, आमवात, हलीमक, भगन्दर, कोढ, प्लीहा और गुल्म आदि रोगोंको नष्ट करती है ॥ ३७ ॥

श्रीवैद्यनाथादेशवटिका ।

त्रिकटुकंपारदपथ्यासम्भागं कनकं फलं द्विगुणम् ।
माषप्रमाणवटिका कार्या स्वरसेन चाम्ललोणस्य ॥ ३८ ॥